By संतोष उत्सुक | Sep 04, 2024
ज़माना नकली बुद्धि का है तभी तो काफी कुछ कृत्रिम हो रहा है। देखा जाए तो असली की ज़रूरत कम रह गई है। अब तो सम्बन्ध, विचार, नफरत और प्यार सब कृत्रिम होते जा रहे हैं और आकर्षक जैविक पैकिंग में मिल रहे हैं। हर पैक पर घटकों का विवरण है जो एक विज्ञापन ही है और विज्ञापन आकर्षित करने के लिए बनाए जाते हैं। ज़िंदगी को ज़्यादा जैविक बनाने के उपाय बाज़ार में बढ़ते जा रहे हैं तो विज्ञापन पकाने वाले पीछे क्यूं रहेंगे।
समझदारी में डूबा विज्ञापन का लाभदायक धंधा करने वालों की कल्पना किसी को नहीं छोड़ती। उनकी कारीगरी समझती है कि इंसान अब वस्तु हो गया है। प्रेरणा देने जैसा पुण्य कमाऊ काम करना अब उसके बस में नहीं रहा। अब वह हर क्षेत्र में कोचिंग देता और लेता है। इसलिए विज्ञापन की भाषागिरी भावनात्मक खेल खेलती है।
विज्ञापन अब गुणवत्ता, पवित्रता, एकता, देश और भगवान को ज्यादा समर्पित होने लगे हैं। नाम और शब्द की महिमा उगाई जा रही है। अगरबत्ती इस मामले में अब नई सुगंध फैला रही है। इसके नए विज्ञापन में कहा जा रहा है अगरबत्ती, स्वच्छता और शुद्धि के लिए उपयोग की जाती है। आत्मपरीक्षण और आत्म सुधार के महत्त्व को सिखाती है। यदि हम सीखना चाहें की शर्त लागू है । अगला सुगंधित प्रवचन है, यह हमें याद दिलाती है कि जीवन में सब कुछ अस्थायी है। अगरबत्ती पूरी तरह से जलकर जीवन लक्ष्यों को प्राप्त करने में धैर्य और दृढ़ता के महत्त्व को सिखाती है। किसी बड़े उद्देश्य के साथ जुड़ने की याद दिलाती है।
जलने के बाद हवा में फैली रहती सुगंध समझाती है कि हमारी विरासत, स्वार्थी संसार से हमारे जाने के बाद भी जीवित रहती है। जलाकर सुगंध प्राप्त करने के सन्दर्भ में बताया कि इसी तरह प्रतिभा और क्षमता तब दिखाई देती हैं जब उन्हें उपयोग किया जाता है और सकारात्मक प्रभाव होता है। इस असली जैविक विज्ञापन ने त्याग का संदेश भी दिया, अगरबत्ती सुगंध देने के लिए खुद को जलाती है जिससे दूसरे विनम्रता और स्वार्थहीनता सीखते हैं। ऐसे विज्ञापन, ‘सबक तो किसी से भी सीख सकते हैं’ की जैविक सुगंध भी फैला रहे हैं।
- संतोष उत्सुक