देवकी और वासुदेव के पूर्व के दो जन्मों में भी उनके पुत्र बने थे भगवान श्रीकृष्ण

By शुभा दुबे | Aug 10, 2020

जब कंस ने एक-एक करके देवकी के छह बालक मार डाले तब माता देवकी के गर्भ में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण जी पधारे। इससे पहले विश्वात्मा भगवान ने अपनी योगमाया को आदेश दिया कि देवकी के गर्भ से श्री शेष जी को वासुदेव की दूसरी पत्नी रोहिणी के गर्भ में स्थानान्तरित कर दो। तुम नन्द बाबा की पत्नी यशोदा के गर्भ से पैदा होना, मैं देवकी का पुत्र बनूँगा। पृथ्वी के लोग तुम्हारे लिये बहुत से स्थान बनाएँगे और दुर्गा, भद्रकाली, माधवी, कृष्णा, चण्डिका, कुमुदा, वैष्णवी, विजया, शारदा, ईशानी, नारायणी, माया, कन्या और अम्बिका आदि अनेक नामों से पुकारेंगे। जब भगवान के अवतार का समय आया तो चारों ओर अंधकार छाया हुआ था उसी समय सबके हृदय में विराजमान भगवान श्रीविष्णु देवकी के गर्भ से प्रकट हुए।


वासुदेव जी ने देखा कि उनके सम्मुख एक अद्भुत बालक है। उसके नेत्र कमल के समान कोमल और विशाल हैं। चार हाथों में शंख, गदा, चक्र और कमल धारण कर रखा है। वक्षस्थल पर श्रीवत्स का चिह्न अंकित है। गले में कौस्तुभमणि झिलमिला रही है। उनका रूप देखकर सबको बड़ी प्रसन्नता हुई। अपनी बुद्धि को स्थिर करके उन्होंने भगवान के चरणों में अपना सिर झुकाया और हाथ जोड़कर उनकी स्तुति करने लगे। इधर देवकी ने देखा कि मेरे पुत्र में पुरुषोत्तम भगवान के सभी लक्षण उपस्थित हैं। वे भी पवित्र भाव से मुस्कुराती हुई स्तुति करने लगीं।


भगवान श्रीकृष्ण दोनों से बोले- मैंने अपना चतुर्भुजी रूप इसलिए दिखाया है कि तुम्हें मेरे पूर्व अवतारों का स्मरण हो जाये। तुम दोनों मेरे प्रति पुत्र भाव तथा ब्रह्मभाव रखना। इस प्रकार वात्सल्य स्नेह और चिंतन के द्वारा तुम्हें मेरे परमपद की प्राप्ति होगी। भगवान ने कहा- देवी! स्वायम्भुव मन्वन्तर में जब तुम्हारा जन्म हुआ था तब तुम्हारा नाम पृश्नि और वासुदेव जी का नाम सुतपा प्रजापति था। उस समय मैं पृश्नि गर्भ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। दूसरे जन्म में तुम अदिति और वासुदेव जी कश्यप थे। उस समय मैंने तुम्हारे गर्भ से जन्म लिया था और मेरा नाम उपेन्द्र था तथा मेरा नाम वामन अवतार के रूप में प्रसिद्ध हुआ। अब तीसरी बार आपका पुत्र बनकर प्रकट हुआ हूँ। इतना बताकर भगवान चुप हो गये और शिशु रूप धारण कर लिया। तब वासुदेव जी ने भगवान की प्रेरणा से अपने पुत्र को लेकर सूतिकाग्रह से बाहर निकलने की इच्छा प्रकट की। उसी समय नन्द जी की पत्नी यशोदा के गर्भ से उस योगमाया का जन्म हुआ जो भगवान की शक्ति होने के कारण उनके समान ही जन्म रहित हैं।


वासुदेव जी अपनी योगमाया से श्रीकृष्ण को लेकर गोकुल की तरफ चले। घनघोर वर्षा हो रही थी। श्री शेष जी ने छत्रछाया कर रखी थी। यमुना नदी उमड़ रही थी। यमुना जी ने रास्ता दे दिया। वासुदेव जी नन्दबाबा के यहाँ से उस कन्या को ले आये और अपने पुत्र को यशोदा जी के पास सुला दिया। जेल में पहुँच कर वासुदेव जी ने उस कन्या को देवकी के पास सुला दिया और अपने पैरों में बेड़ियां धारण कर लीं तथा दरवाजों पर स्वतः ही ताले लग गये।


-शुभा दुबे

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