Gyan Ganga: भगवान शंकर ने सती जी से पूछा कैसे ली आपने भगवान राम की परीक्षा?

By सुखी भारती | Jun 07, 2024

विगत अंक में हमने देखा, कि श्रीसती जी उलझनों के भयंकर बवंडर में फँस चुकी हैं। वे जिस भी दिशा में देखती हैं, उसी ओर उन्हें भगवान श्रीराम, श्रीजानकी जी एवं श्रीलक्ष्मण जी दृष्टिपात होते हैं। हालाँकि जिस दृश्य का दर्शन श्रीसती जी कर रही हैं, उस दृश्य के साक्षी होने के लिए, बड़े-बड़े ऋर्षि मुनि भी कठिन तपस्यायें करते हैं। किंतु तब भी उन्हें ऐसी एक झलक पाने के लिए कितना ही विकट काल बीत जाता है। वहीं एक श्रीसती जी हैं, कि उन्हें चारों दिशायों में ऐसा शुभ दर्शन हो रहा है। किंतु भाग्य की ऐसी विडम्बना है, कि वे इससे भी भयभीत हो रही हैं। जब उन्हें कुछ समझ नहीं आता, तो श्रीसती जी अपनी आँखें मूँद कर एक स्थान पर बैठ जाती हैं।


कितने आश्चर्य की बात है, प्रभु के जिन दर्शनों को बंद आँखों से देखने भी देखना अथाह कठिन है, उसे वे बाहरी जगत में सहज ही देख पा रही थी। लेकिन कर्मों का फेर ऐसा है, कि श्रीसती जी इस मनमोहक दृष्य को न देख, अपनी आँखों को ही बंद कर लेती हैं। निश्चित ही आँखों को बंद करके एक स्थान पर बैठ जाना, एक महान साधक या तपस्वी के ही संकेत हैं। जैसे कि वटवृक्ष के नीचे भगवान शंकर जी बैठे हैं। लेकिन भगवान शंकर के, एवं श्रीसती जी के आँखों को बंद करने में एक अंतर यह है, भगवान शंकर इसलिए आँखें बंद कर रहे हैं, ताकि भगवान के दर्शन किए जा सकें। जबकि श्रीसती जी आँखें इसलिए बंद कर रही हैं, ताकि प्रभु के दर्शनों से बचा जा सके।

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श्रीराम जी ने भी देखा, कि श्रीसती जी हमारे दर्शनों से आँखें फेर रही हैं, तो उन्होंने भी अपनी लीला समेट ली। श्रीसती जी ने कुछ पलों के पश्चात अपने नेत्रें को खोल कर देखा, तो कहीं भी, किसी भी दिशा में, श्रीराम जी का कोई प्रतिबिंब प्रतीत नहीं हो रहा था। ऐसा देख श्रीसती जी ने बार-बार प्रणाम किया, और वहाँ चली, जिधर भोलेनाथ बिराजमान थे-


‘बहुरि बिलोकेउ नयन उघारी।

कछु न दीख तहँ दच्छकुमारी।।

पुनि पुनि नाइ राम पद सीसा।

चली तहाँ जहँ रहे गिरीसा।।’


यहाँ एक बात तो स्पष्ट है, कि श्रीसती जी ने आँखें खोल कर जो श्रीराम जी को प्रणाम किया, उसमें उनका कोई श्रद्धा भाव नहीं था, अपितु यह भाव था, कि चलो अच्छा हुआ, पीछा छुटा। अन्यथा अगर श्रीसती जी को, श्रीराम जी को प्रणाम करने का इतना ही मोह था, तो वे पहले श्रीराम जी को देख कर क्यों प्रणाम नहीं कर रही थी। श्रीसती जी इस समय, इस धरा की सबसे उलझी हुई जीव थी। तब भी, ऐसी उलझन में भी उनके साथ, एक पक्ष अतिअंत दृड़ था, कि वे ऐसे में भी उधर जा रही थी, जिस ओर भगवान वटवृक्ष के नीचे बिराजमान थे। किंतु विचार करने की बात यह थी, कि क्या अब श्रीसती जी अपने मन की कुंठा का समाधान कर पायेंगी? निश्चित ही समाधान होना संभव था। लेकिन प्रश्न तो यह है, कि क्या श्रीसती जी, भगवान शंकर के पास जाकर कैसा व्यवहार करती हैं। क्या वे स्वयं को पूर्णतः समर्पित कर देती हैं, अथवा अब भी उनके मन में कोई संशय है?


इसका उत्तर तो भविष्य के गर्भ में है। जिसे हम अभी जान लेते हैं। क्योंकि जैसे ही श्रीसती जी भगवान शंकर जी के पास जाती हैं, तो इससे पहले वे कुछ बोलती, स्वयं भोलेनाथ ही प्रश्न कर देते हैं-


‘गईं समीप महेस हँसि पूछी कुसलात।

लीन्हि परीछा कवन बिधि कहहु सत्य सब बात।।’


श्रीसती जी के तो मुख की आभा ही समाप्त थी। लेकिन भगवान शंकर ने तब भी हँस कर पूछा, कि ‘हे सती! तुमने श्रीराम जी की की परीक्षा कैसे-कैसे ली, सारी बात मुझे सच-सच बतायो।


श्रीसती जी ने देखा, कि अरे! भगवान शंकर तो मुझसे हँस कर बात कर रहे हैं। इसका तात्पर्य तो यही हुआ, कि वे मुझसे खिन्न नहीं हैं। वे मुझसे असंतुष्ट होते, तो वे मुझसे इसी क्षण क्रोधित होते। हो सकता है, कि मुझसे श्राप भी दे देते। लेकिन उनके मुख मण्डल पर तो मेरे प्रति कोई एक भी चिन्न नहीं, कि मैं उनसे भयभीत होऊँ। तो ऐसे में मुझे क्या करना चाहिए। क्या प्रभु को मुझे सच में सत्य बताना चाहिए?


इसी अधेड़ बुन में श्रीसतीजी, मन में बहुत कुछ सोचे जा रही हैं। किंतु श्रीसती जी कुछ भी निर्णय नहीं ले पा रही हैं। समय बहुत कम था। श्रीसती जी को कुछ तो कहना ही था। वे सत्य ही कह देती हैं, अथवा कोई ओर झोल कर देती हैं, जानेंगे अगले अंक में---(क्रमशः)---जय श्रीराम।


- सुखी भारती

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