By प्रभाकर पाठक | Oct 25, 2026
रामलीला का मंच सजने से पहले हर साल एक परंपरा निभाई जाती है। कई रामलीला समितियां पंजाब के अमृतसर में बने भगवान वाल्मीकि तीर्थ स्थल (राम तीर्थ) जाती हैं और वहां से पवित्र जल व अखंड ज्योति लेकर लौटती हैं। यह भगवान वाल्मीकि का आश्रम था, जहां माता सीता ने निवास किया और लव-कुश का जन्म हुआ। राम के चरित्र का मंचन उस भूमि के आशीर्वाद से शुरू होता है, जहां से राम कथा निकली। आश्विन पूर्णिमा को आने वाली वाल्मीकि जयंती इसी स्मरण का दिन है।
आज घर-घर में भगवान श्रीराम का नाम है, तो इसकी नींव वाल्मीकि की रामायण ने रखी। उन्होंने केवल घटनाएं नहीं दर्ज कीं। उन्होंने श्रीराम के जीवन को आदर्शों के रूप में सामने रखा:
• पिता के वचन के लिए राजपाट छोड़ देने का त्याग
• वनवास के कष्टों में धैर्य
• शबरी के जूठे बेर स्वीकार करने की विनम्रता
• शत्रु के प्रति भी मर्यादा
• प्रजा के विश्वास को अपने सुख से ऊपर रखने की भावना
बाद में कई भाषाओं के कवियों ने राम को अपने ढंग से गाया, पर सबकी जड़ में वही आदिकाव्य है। इसीलिए भगवान वाल्मीकि को आदिकवि कहा जाता है। उन्होंने राम के जीवन आदर्शों को काव्य का रूप दिया।
वाल्मीकि केवल कथाकार नहीं थे। जब लोकापवाद के कारण माता सीता को वन जाना पड़ा, तब उन्हें आश्रय उनके आश्रम में मिला। जिस घड़ी में अपने भी दूर हो गए, उस घड़ी में एक ऋषि बिना किसी शर्त के सहारा बने। वहीं लव और कुश का जन्म हुआ। भगवान वाल्मीकि ने दोनों को शिक्षा, संस्कार और शस्त्र-विद्या दी। यही बालक आगे चलकर रामकथा का गान करते हुए अयोध्या पहुंचे। रचयिता का सिखाया गायन उन्हीं के शिष्यों के स्वर में लौटकर राम के दरबार तक पहुंचा।
उनके आश्रम में ऊंच-नीच का कोई भेद नहीं था। राजपुत्र और वनवासी बालक एक ही गुरु से सीखते थे। आज वाल्मीकि जयंती पर निकलने वाली शोभायात्राओं, पूजन, भजन-कीर्तन और रामकथा के आयोजनों में सभी वर्गों के लोग साथ दिखते हैं। यह उसी समरसता की झलक है, जो उनके आश्रम की पहचान थी।
जयंती केवल जयकारे लगाने और झांकियां निकालने का दिन नहीं है। भगवान वाल्मीकि ने श्रीराम के आदर्श इसलिए लिखे कि समाज उन्हें अपनाए। इसलिए हमें अपने आसपास देखना चाहिए कि कोई उपेक्षित तो नहीं, किसी के साथ भेदभाव तो नहीं हो रहा, किसी को सहारे की आवश्यकता तो नहीं। जिस परंपरा ने सीता को आश्रय दिया, उसे मानने वाले को दूसरों के लिए आश्रय बनना आना चाहिए। भगवान वाल्मीकि को इससे बड़ी श्रद्धांजलि कोई नहीं हो सकती।