By नीरज कुमार दुबे | Aug 24, 2026
मोहब्बत की राह में सरहदें अक्सर दीवार बन जाती हैं, लेकिन जब रिश्तों की डोर मजबूत हो तो बंद दरवाजों के बीच भी आसमान रास्ता बना देता है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव बढ़ा और वाघा-अटारी सीमा बंद हो गई। इसके साथ ही सिंध की सैकड़ों युवतियों के सपनों में सजा भारत में विवाह का सपना भी अधर में लटक गया। लेकिन इंतजार के लंबे और बेचैन महीनों के बाद आखिरकार उम्मीद ने फिर उड़ान भरी। केंद्रीय गृह मंत्रालय की विशेष रियायत और सिंध के प्रतिष्ठित शदाणी दरबार के प्रयासों से कम से कम 150 पाकिस्तानी दुल्हनें अलग-अलग देशों के रास्ते भारत पहुंचीं और अपने जीवनसाथियों के साथ सात फेरे लेकर मांग में सिंदूर सजाया।
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, नागपुर में रहने वाले इंकेश जशनानी और सिंध की आरती की कहानी इस इंतजार की सबसे भावुक तस्वीर है। दोनों की सगाई ऑपरेशन सिंदूर से पहले हो चुकी थी और शादी की तैयारियां भी थीं। मई 2025 में आरती खतरनाक और लंबा सफर तय कर सिंध के खानपुर तहसील से अटारी सीमा तक पहुंच चुकी थीं। वह भारत की सीमा से महज एक किलोमीटर दूर थीं कि अटारी गेट बंद कर दिया गया। एक साल से अधिक के इंतजार के बाद आखिरकार आरती मस्कट के रास्ते नागपुर पहुंचीं और मार्च में अपने प्रेम को शादी का नाम दिया। लेकिन इस खुशी में भी एक अधूरापन है। वीजा प्रतिबंधों के कारण उनके साथ केवल भाई आ सका, जबकि माता-पिता पाकिस्तान में ही रह गए। आरती की सबसे बड़ी ख्वाहिश अब बस इतनी है कि सरहदें खुलें और वह एक बार फिर अपने माता-पिता से मिल सकें।
ऐसी ही एक और कहानी नागपुर में भारतीय नागरिकता हासिल कर चुके संजय कलानी की मंगेतर काजल की है जोकि सिंध के घोटकी जिले की रहने वाली हैं। तीन साल पहले हुई सगाई के बाद शादी का सपना तैयार था, लेकिन ऑपरेशन सिंदूर और सीमा बंद होने के कारण दोनों का मिलन टलता चला गया। आखिरकार उम्मीद ने फिर दस्तक दी। काजल कराची से मस्कट होते हुए दिल्ली पहुंचीं और फिर नागपुर में संजय के साथ विवाह बंधन में बंध गईं। करीब पांच महीने पहले हुई इस शादी ने उस इंतजार को खत्म किया, जो कभी अंतहीन लगने लगा था। साथ ही संजय के भाई धीरज की कहानी भी कुछ ऐसी ही रही। उनकी मंगेतर संजना सिंध के अंदरूनी इलाके मीरपुर से उसी लंबी हवाई यात्रा के रास्ते भारत पहुंचीं और दोनों का रिश्ता भी आखिरकार शादी की मंजिल तक पहुंच गया।
हम आपको यह भी बता दें कि सिर्फ दुल्हनें ही भारत नहीं आईं। सिंध के घोटकी से रबेल जसवानी अपने माता-पिता के साथ नागपुर पहुंचे और यहां श्रिया से शादी की। शादी के बाद रबेल भारत में ही रह गए हैं। उनकी इच्छा है कि भविष्य में हालात सामान्य हों, सीमाएं खुलें और वह अपने माता-पिता को भी भारत ला सकें। यानी इस कहानी में सिर्फ दुल्हनें अपने सपनों के घर नहीं पहुंचीं, बल्कि एक दूल्हा भी मोहब्बत के लिए सरहदों का लंबा चक्कर काटकर भारत आया।
हम आपको बता दें कि सिंध के घोटकी स्थित ऐतिहासिक शदाणी दरबार ने इन बिछड़े हुए रिश्तों को मिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उल्लेखनीय है कि 18वीं सदी के संत शादाराम साहिब की स्मृति से जुड़े इस दरबार का दोनों देशों के सिंधी समुदाय में विशेष महत्व है। दरबार के वर्तमान पीठाधीश संत युधिष्ठिरलाल शदाणी, जो इस परंपरा की नौवीं पीढ़ी से जुड़े हैं और वर्तमान में रायपुर में रहते हैं, उन्होंने पाकिस्तान में फंसी दुल्हनों के मामले को उठाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
लेकिन प्रेम की यह उड़ान अभी पूरी नहीं हुई है। समुदाय के प्रतिनिधियों के अनुसार, यह सिंध से भारत पहुंची दुल्हनों का पहला बड़ा समूह है। करीब 300 युवतियां अभी भी भारत में अपने होने वाले जीवनसाथियों से विवाह करने का इंतजार कर रही हैं। देखा जाये तो सरहदें आज भी बंद हो सकती हैं, वीजा की पाबंदियां रिश्तों की राह कठिन बना सकती हैं, लेकिन आरती, काजल, संजना और रबेल की कहानियां एक बात जरूर कहती हैं कि मोहब्बत को अगर मंजिल तक पहुंचना हो, तो वह कोई भी रास्ता चुन लेती है।