राजनाथ सिंह के यहां लंच, जेपी नड्डा के घर डिनर, दिल्ली में BJP-NDA की राजनीतिक हलचल तेज

By नीरज कुमार दुबे | Nov 27, 2025

बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए की प्रचंड जीत के बाद भारतीय राजनीति में हलचल थमने का नाम नहीं ले रही। जहाँ सत्ता पक्ष इस विजय को राष्ट्रीय जनमत के रूप में प्रस्तुत कर रहा है, वहीं विपक्ष का संकट और गहराता दिखाई देता है। इसी बीच कांग्रेस के भीतर खुले असंतोष ने पार्टी नेतृत्व की कमजोर पकड़ को उजागर कर दिया है। बिहार में चुनावी नतीजों के बाद कांग्रेस नेता अखिलेश प्रसाद सिंह ने जहां हार पर गहरी निराशा जताई, वहीं वरिष्ठ नेता राशिद अल्वी ने खुलकर केंद्रीय नेतृत्व पर निशाना साधते हुए कहा कि बिहार में कांग्रेस का प्रदर्शन “भाजपा की मेहनत के सामने कहीं नहीं था।” यही नहीं, राशिद अल्वी ने राहुल गांधी को “अप्राप्य” बताते हुए पार्टी की कमान प्रियंका गांधी वाड्रा को सौंपने की वकालत तक कर डाली। राशिद अल्वी ने कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व पर सवाल दागते हुए कहा, “राहुल गांधी से मिलना आसान नहीं है, पार्टी को सुधारना है तो प्रियंका गांधी को कमान दें। हम आपको याद दिला दें कि यही बात पहले भी कई नेता कह चुके हैं कि राहुल गांधी से मुलाकात का समय नहीं मिलता और समय मिलता भी है तो राहुल गांधी मुलाकात के समय बात सुनने की बजाय कुत्ते को बिस्किट खिलाने में व्यस्त रहते हैं।

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शाम को भाजपा अध्यक्ष नड्डा ने बिहार विजय में योगदान देने वाले कार्यकर्ताओं के सम्मान में अपने आवास पर रात्रिभोज रखा। इस कार्यक्रम में गृह मंत्री अमित शाह के संबोधन ने भाजपा की आगे की दिशा स्पष्ट कर दी। शाह ने बिहार जीत को “पूरे देश की जीत” बताते हुए जोर दिया कि जनता ने एक बार फिर मोदी–नीतीश नेतृत्व पर भरोसा जताया है। उन्होंने कार्यकर्ताओं से साफ कहा— “हमें रुकना नहीं है, बंगाल और तमिलनाडु की तैयारी शुरू कर दीजिए।” यह बयान साफ संकेत देता है कि भाजपा आने वाले चुनावों को 2029 की राह में महत्वपूर्ण पड़ाव मान रही है।

देखा जाये तो बिहार की जीत का राजनीतिक प्रभाव तात्कालिक सीमाओं से आगे जाता है। यह भाजपा के लिए सिर्फ एक राज्य की सत्ता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आत्मविश्वास का आधार बन गया है। चुनाव परिणामों ने संकेत दे दिया है कि भाजपा आने वाले महीनों में विपक्ष से कहीं अधिक संगठित, उत्साहित और रणनीति-प्रधान रूप में उभरेगी। वहीं विपक्ष, विशेषकर कांग्रेस, नेतृत्व संकट से जूझ रहा है। राशिद अल्वी का बयान इस संकट की गहराई को स्पष्ट करता है। INDIA गठबंधन पहले ही असमंजस में था; बिहार की करारी हार ने उसे और बिखेर दिया है।

इस पृष्ठभूमि का सबसे बड़ा असर संसद के शीतकालीन सत्र में दिखेगा। एनडीए के भीतर बढ़ी एकजुटता और चुनावी विजय से उपजा आत्मविश्वास सरकार को महत्वपूर्ण विधेयकों को आगे बढ़ाने की शक्ति देगा। भाजपा का मानना है कि विपक्ष न तो एकजुट है और न ही संसद में प्रभावी प्रतिरोध पेश कर पाएगा। माना जा रहा है कि सुधारों, सुरक्षा से जुड़े कानूनों और आर्थिक नीतियों को लेकर सरकार पहले से कहीं ज्यादा आक्रामक रुख में दिखाई देगी।

उधर, भाजपा संगठन में बड़ा बदलाव भी करीब है। जेपी नड्डा का कार्यकाल समाप्त हो चुका है और पार्टी अध्यक्ष के नए चेहरे को लेकर चर्चा तेज है। बिहार की जीत ने यह अनुमान और मजबूत किया है कि नया अध्यक्ष ऐसा होगा जो चुनावी रणनीति, संगठन विस्तार और 2029 मिशन में निर्णायक भूमिका निभा सके। पार्टी के भीतर ऐसे कई नाम चर्चा में हैं जो युवावर्ग तक मजबूत पहुंच रखते हैं और पूर्वी–दक्षिणी भारत में भाजपा के विस्तार को गति दे सकते हैं।

कुल मिलाकर, आज की राजनीति दो विपरीत छोरों पर खड़ी है- एक ओर भाजपा, जो चुनावी विजय, मजबूत नेतृत्व और संगठित रणनीति के बूते राष्ट्रीय राजनीति की धुरी बनने को तैयार है; दूसरी ओर विपक्ष, जो बिखरा, दिशाहीन और आंतरिक कलह से जूझता हुआ नजर आ रहा है। यदि विपक्ष ने अपनी रणनीति और नेतृत्व संरचना में तत्काल बदलाव नहीं किया, तो उसके लिए भाजपा को रोकना केवल चुनौती ही नहीं बल्कि लगभग असंभव लक्ष्य बन सकता है। बहरहाल, बुधवार को राजनाथ सिंह के यहां लंच और जेपी नड्डा के घर डिनर पर जो रणनीति बनी उससे भाजपा और एनडीए का आत्मविश्वास राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ा हुआ दिखाई दे रहा है।

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