हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान के उपासक थे मदन मोहन मालवीय जी

By मृत्युंजय दीक्षित | Dec 25, 2022

आधुनिक भारत में प्रथम शिक्षा नीति के जनक, शिक्षा के विशाल केंद्र काशी हिंदू विश्वविद्यालय के संस्थापक, सांस्कृतिक नवजागरण स्वदेशी एवं हिंदी आंदोलनों के प्रवर्तक राष्ट्रभक्त महान समाज सुधारक भारतीय काया में पुनः नयी चेतना एवं ऊर्जा का संचार करने वाले महामना मदन मोहन मालवीय का जन्म 25 दिसम्बर 1861 को हुआ था। मालवीय जी के पिता पण्डित ब्रजनाथ कथा, प्रवचन और पौरोहित्य से ही अपने परिवार का पालन- पोषण करते थे। प्राथमिक शिक्षा पूर्ण करके मालवीय जी ने संस्कृत व अंग्रेजी पढ़ी। मालवीय जी युवावस्था में अंग्रेजी तथा संस्कृत दोनों ही भाषाओं में धाराप्रवाह बोलते थे। महामना मदन मोहन मालवीय बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। खेलकूद, व्यायाम,कुश्ती, बांसुरी एवं सितार वादन में उनकी रुचि थी। बाल जीवन में ही एक भाषण- दल बनाया था जो चौराहों पर तथा मेलों, सभाओं में विभिन्न विषयों पर भाषण दिया करता था। कवि और साहित्यकार की प्रतिभा भी विद्यमान थी। भारतेंदु हरिश्चंद्र  की कवि मंडली में भी जुड़े हुए थे। 

हिंदू धर्म व समाज पर जब भी कोई संकट आता तो वे तुरंत सक्रिय हो जाते थे। हिंदी, हिंदू और हिंदुस्तान के लिए 24 घंटे कार्यरत रहते थे। उन्होने 10 अक्टूबर 1910 को काशी में आयोजित हिंदी साहित्य सम्मेलन के प्रथम अधिवेशन की अध्यक्षता की और अपने अध्यक्षीय भाषण में उन्होंने सभी से हिंदी सीखने का आह्वान किया। 19 अप्रैल 1919 को बम्बई में आयोजित हिंदी साहित्य सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए मालवीय जी ने देवनागरी लिपि में लिखी गयी हिंदी भाषा को राष्ट्रभाषा की मान्यता प्रदान करने पर जोर दिया। मालवीय जी भारतीय विद्यार्थियों के लिए प्राचीन भारतीय दर्शन, साहित्य, संस्कृति और अन्य सुविधाओं के साथ- साथ अर्वाचीन नीतिशास्त्र, समाज विज्ञान, मनोविज्ञान, विधि विज्ञान, अर्थशास्त्र और राजनीति का अध्ययन आवश्यक  समझते थे। हिंदी की सेवा और गोरक्षा में  उनके प्राण बसते थे। 

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उन्होने लाला लाजपत राय और स्वामी श्रद्धानंद के साथ मिलकर अखिल भारतीय हिंदू महासभा की स्थापना की थी। वे 1923, 24 और 36 में अखिल भारतीय हिंदू महासभा के अध्यक्ष रहे। जबकि 1909, 18, 32, 33 में वे अखिल भारतीय कांग्रेस के अध्यक्ष रहे। वे महान समाजसेवी भी थे। समाज में व्याप्त कुरीतियों को दूर करने के लिए सतत प्रयास किये। महिलाओं में निरक्षरता को समाप्त करने के लिए अनेक शिक्षण संस्थाएं खुलवायीं।उन्होनें अपने जीवनकाल में ही व्यायामशाला, गौशाला और मंदिर भी बनवाये और हिंदू के प्रति प्रेम होने के कारण उन्होनें हजारों हरिजन बंधुओं को ऊँ नमः शिवाय और गायत्री मंत्र की दीक्षा दी।  

मालवीय जी ने नवम्बर सन  1889 में भारती भवन नाम से पुस्तकालय स्थापित करवाया। जिसका उद्देश्य हिंदी और संस्कृत पुस्तकों का संग्रह और अध्ययन था। मालवीय जी ने हिंदू विद्यार्थियों के रहने के लिए एक छात्रावास के निमित्त प्रांतों में घूम -घ–कर धन एकत्र किया। वे जीवन पर्यंत  समाजसेवा में रत रहे । 

अगस्त 1946 में जब मुस्लिम लीग ने सीधी कार्यवाही के नाम पर पूर्वोत्तर भारत में  कत्लेआम किया तो मालवीय जी बीमार थे। वहां हिंदू नारियों पर अत्याचारों को सुनकर वे रो पड़े। इसी अवस्था में 12 नवंबर 1946 को उनका देहान्त हुआ।

- मृत्युंजय दीक्षित

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