करोली में स्थित मदन मोहन मंदिर का है ऐतिहासिक महत्व

By डॉ. प्रभात कुमार सिंघल | Aug 29, 2017

वैष्णव मत के मंदिरों की श्रृंखला में भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित मदन मोहन जी का मंदिर राजस्थान की राजधानी जयपुर से 182 किलो मीटर दक्षिण पूर्व में करोली जिला मुख्यालय पर स्थित है। राजस्थान में कृष्ण के अनेक मंदिरों में मदन मोहन मंदिर भी अपना विशेष स्थान रखता है। यह मंदिर भी वैष्णव पद्धति के अनुरूप हवेली में ही बनाया गया है, जो करोली महल का एक हिस्सा है। मदन मोहन जी मंदिर का गर्भगृह तीन खण्डों में विभक्त है। मध्य में वेदी पर कृष्ण स्वरूप में मदन मोहन जी विराजते हैं तथा उनके दांई ओर के खण्ड में राधा एवं ललिता देवी साथ−साथ हैं तथा बांई ओर वेदी पर गोपाल जी कृष्ण स्वरूप में विराजमान हैं। मध्य भाग में एन्टिक महत्व की भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति तीन फुट एवं राधा की मूर्ति दो फुट ऊंची अष्ट धातु की हैं। ये मूर्तियां एंटिक हैं। मंदिर में विराजमान श्रीकृष्ण का विग्रह शैशव स्वरूप होने के कारण भक्ति का प्रमुख स्त्रोत है।

मंदिर में 5 बार भोग लगाया जाता है, जिसमें दोपहर का राजभोग एवं सायंकाल शयन भोग प्रमुख हैं। विशेष अवसरों पर छप्पन भोग भी लगाया जाता है। प्रातः 5 बजे मंगला आरती, 9 बजे धूप आरती, 11 बजे श्रृंगार आरती, दोपहर 3 बजे धूप आरती एवं सायं 7 बजे संध्या आरती की जाती है। मंदिर प्रातः 5 बजे से रात्री 10 बजे तक खुला रहता है। मंदिर का सबसे प्रबल एवं मूलाधार उत्सव मदन मोहन जी का मेला है जो अमावस्या पर आयोजित किया जाता है। मंदिर में आयोजित जन्माष्टमी, राधा अष्टमी, गोपाष्टमी एवं हिंडोला उत्सवों में सैलानी भी बड़ी संख्या में भाग लेते हैं।

मदन मोहन जी की प्रतिमा मूल रूप से वृंदावन में कालीदह के पास द्वादशादित्य टीले से प्राप्त हुई थी। वृंदावन पर औरंगजेब के हमले के दौरान मूल मंदिर का शिखर (शिखर) ध्वस्त किया गया था। मुगलों के आक्रमण के समय सुरक्षा की दृष्टि से मूर्ति को जयपुर ले जाया गया था। करोली के मंदिर का निर्माण यहां के राजा गोपाल सिंह ने 1725 ई. में करवाया था। बताया जाता है कि दौलताबाद पर विजय के बाद महाराजा गोपाल सिंह को सपना आया जिसमें उन्हें मदन मोहन जी ने कहा कि मुझे करोली ले चलो तब मदन मोहन की प्रतिमा को जयपुर के आमेर से लाकर यहां करोली में स्थापित किया गया। महाराजा गोपाल सिंह ने मुर्शिदाबाद के रामकिशोर को मंदिर सेवा का प्रथम प्रभार सौंपा था। इसके बाद मदन किशोर यहां के गुंसाई रहे। उस समय करोली के मंदिर को राजघराने की ओर से अचल संपत्ति प्रदान की गई जिससे 18वीं सदी में 27 हजार रूपया सालना आय होती थी।

डॉ. प्रभात कुमार सिंघल 

लेखक एवं पत्रकार

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