By अनन्या मिश्रा | May 09, 2026
आज ही के दिन यानी की 09 मई को महाराणा प्रताप का जन्म हुआ था। उन्होंने राजस्थान में राजपूतों की शान को ऐसी ऊंचाई दी, जिसकी मिसाल पूरी दुनिया में नहीं मिलती है। मेवाड़ के राजा महाराणा प्रताप ने कभी भी गुलामी स्वीकार नहीं की थी। महाराणा प्रताप ने अपने समकालीन मुगल शासक अकबर से लोहा लेकर पूरी दुनिया को दिखा दिया था कि वह महाराणा क्यों कहे जाते हैं। उन्होंने कभी भी मुगलों के किसी भी तरह के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर महाराणा प्रताप के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...
महाराणा प्रताप ने मुगलों के बार बार हुए हमलों से मेवाड़ की रक्षा की और अपने आन बान के लिए कभी मुगलों से समझौता नहीं किया। उनको अपने पिता की गद्दी पाने के लिए अपनी सौतेली मां रानी धीरबाई के विरोध का सामना करना पड़ा था। रानी धीरबाई चाहती थीं कि उनके बेटे कुंवर जगमाल को मिले, लेकिन राज्य के मंत्री और दरबारी चाहते थे कि राणा प्रताप उनके राजा बनें। ऐसे में कुंवर जगमाल ने मेवाड़ छोड़ दिया और अकबर के संपर्क में आए। अकबर ने जगमाल को जहाजपुर की जागीर उपहार स्वरूप दे दी।
महाराणा प्रताप भारत के सबसे ताकतवर योद्धा थे। उनका कद 7 फुट 5 इंच था और वह अपने साथ 80 किलो का भाला और दो तलवारें रखते थे। जिनका वजन करीब 208 किलो होता था। महाराणा का कवच 72 किलो का था। बताया जाता है कि राणा प्रताप की तलवार के एक वार से घोड़े के दो टुकड़े हो जाते थे।
प्रताप की ताकत का अंदाजा लोगों और राजपूतों को 18 जून 1576 में हल्की घाटी के युद्ध में हुआ था। इससे पहले मुगल शासक अकबर ने प्रताप के पास 6 प्रस्ताव भेजे, लेकिन प्रताप ने अकबर की अधीनता में मेवाड़ के शासन को स्वीकार नहीं किया। जिसके बाद अकबर ने मानसिंह और असफ खान को प्रताप से युद्ध के लिए भेजा और साथ में एक विशाल सेना भेजी। प्रताप और अकबर की सेनाएं उदयपुर से करीब 40 किमी दूर हल्दीघाटी में मिलीं।
भले ही इस युद्ध में मुगलों की जीत हुई, लेकिन वास्तव में वह जीत किसी की नहीं मानी गई। वहीं राणा प्रताप ने मुगलों की नाक में दम कर दिया था। मुगल इस युद्ध में प्रताप और उनके परिवार को नुकसान नहीं पहुंचा सके थे। महाराणा प्रताप अपने घोड़े चेतक की मौत और खुद भी घायल होने के बाद मैदान से बचकर निकलने में सफल रहे।
हालांकि हल्दीघाटी के युद्ध के बाद महाराणा प्रताप का जीवन संघर्षमय रहा। उन्होंने सेना एकत्र कर छापामार रणनीति अपनाई और दुश्मनों को चैन नहीं रहने दिया। उनकी यह रणनीति सफल रही और इस दौरान उनको भामाशाह की मदद मिली। देवगढ़ के युद्ध में महाराणा प्रताप ने मेवाड़ का अधिकतर हिस्सा हासिल कर लिया, लेकिन वह चित्तौड़ नहीं हासिल कर सके। वहीं इसके बाद बादशाह अकबर ने भी मेवाड़ अभियान छोड़ दिया।
वहीं महाराणा प्रताप की मृत्यु 19 जनवरी 1597 को 57 वर्ष की आयु में चावंड में हुई थी।