By Neeraj Kumar Dubey | Jul 01, 2022
महाराष्ट्र के 20वें मुख्यमंत्री एकनाथ संभाजी शिंदे शिवसेना के एक मजबूत नेता के रूप में उभर कर शीर्ष पद को हासिल कर चुके हैं लेकिन यहां तक पहुंचने के लिए उन्होंने अपने जीवन में बहुत कड़ी मेहनत की है। जमीन से जुड़े शिंदे अपने राजनीतिक कैरियर की शुरुआत से पूर्व रोजी रोटी कमाने के लिए आटो रिक्शा चलाते थे। शिंदे ने शिवसेना में एक कार्यकर्ता के रूप में राजनीतिक पारी की शुरुआत की और वह अपने संगठनात्मक कौशल तथा जनसमर्थन के बल पर शिवसेना के शीर्ष नेताओं में शुमार हो गए। कभी मुंबई से सटे ठाणे शहर में ऑटो चालक के रूप में काम करने वाले 58 वर्षीय शिंदे ने राजनीति में कदम रखने के बाद बेहद कम समय में ठाणे-पालघर क्षेत्र में शिवसेना के प्रमुख नेता के तौर पर अपनी पहचान बनायी। उन्हें जनता से जुड़े मुद्दों को आक्रामक तरीके से उठाने के लिए पहचाना जाता है।
शिवसेना में शामिल होने के बाद उन्हें पार्टी के मजबूत नेता आनंद दिघे का मार्गदर्शक मिला। 2001 में दीघे की आकस्मिक मृत्यु के बाद उन्होंने ठाणे-पालघर क्षेत्र में पार्टी को मजबूत किया। ठाणे शहर की कोपरी-पचपखाड़ी सीट से विधायक शिंदे सड़कों पर उतरकर राजनीति करने के लिए पहचाने जाते हैं और उन पर हथियारों से जानबूझकर चोट पहुंचाने और दंगा करने समेत विभिन्न आरोपों में दर्जनों मामले दर्ज हैं। शिंदे 1997 में ठाणे नगर निगम में पार्षद चुने गए थे और इसके बाद वह 2004 के विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज कर पहली बार विधायक बने। 2005 में उन्हें शिवसेना का ठाणे जिला प्रमुख बनाया गया । शिंदे के कद का अंदाजा इससे ही लगाया जा सकता है कि उन्हें पार्टी में दूसरे सबसे प्रमुख नेता के रूप में देखा जाता है। शिंदे के बेटे डॉ. श्रीकांत शिंदे कल्याण सीट से लोकसभा सदस्य हैं। शिंदे को 2014 में संक्षिप्त अवधि के लिए महाराष्ट्र विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष भी नियुक्त किया गया था। बाद में शिवसेना, भाजपा नीत सरकार में शामिल हो गई थी।
कोविड-19 महामारी के दौरान, राकांपा के पास स्वास्थ्य मंत्रालय होने के बावजूद, शिंदे-नियंत्रित महाराष्ट्र राज्य सड़क विकास निगम ने कोरोना वायरस के रोगियों के इलाज के लिए मुंबई और उसके उपनगरों में स्वास्थ्य केंद्र स्थापित किए। शिंदे को नक्सल प्रभावित गढ़चिरौली जिले (ठाणे के साथ) का संरक्षक मंत्री बनाया गया था। माना गया कि उन्हें नीचा दिखाने के लिए ऐसा किया गया। शिंदे, हालांकि, एक प्रमुख शिवसेना नेता बने रहे, क्योंकि उन्होंने अपना खुद का एक मजबूत समर्थन आधार विकसित किया था। वह पार्टी कार्यकर्ताओं और सहयोगियों के लिए हमेशा उपलब्ध रहने के लिए जाने जाते हैं और अक्सर पार्टी के साधारण कार्यकर्ताओं के घरों में जाते हैं। शिवसेना के अधिकांश विधायकों को अपने साथ ले जाने और मुख्यमंत्री बनने के बाद, शिंदे की अगली चुनौती उद्धव ठाकरे और उनके वफादारों से पार्टी संगठन की कमान अपने हाथों में लेने की होगी।
सतारा के रहने वाले महाराष्ट्र के चौथे मुख्यमंत्री हैं शिंदे
एकनाथ शिंदे महाराष्ट्र के ऐसे चौथे मुख्यमंत्री बन गए जो राज्य के सतारा जिले के रहने वाले हैं। हालांकि शिंदे ने मुंबई के निकट ठाणे में शिवसेना के नेता के तौर पर अनुभव प्राप्त किया, जबकि वह सतारा शहर से 60 किमी दूर दरे तांब गांव के रहने वाले हैं। उनसे पहले, राज्य के तीन मुख्यमंत्री इसी जिले (सतारा) से रहे हैं। उनमें यशवंतराव चव्हाण (राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री), बाबासाहेब भोसले और पृथ्वीराज चव्हाण शामिल हैं। राज्य के एक अन्य पूर्व मुख्यमंत्री शरद पवार मुख्य रूप से पुणे जिले के बारामती से हैं।
बगावत के बाद शिवसेना के लिए आगे की राह मुश्किलों भरी
एकनाथ शिंदे की बगावत और इसके परिणाम स्वरूप उद्धव ठाकरे के इस्तीफे के बाद शिवसेना अब राजनीतिक दोराहे पर है। शिवसेना के संस्थापक बाला साहेब ठाकरे के 2012 में निधन के बाद पार्टी के समक्ष यह पहली बड़ी चुनौती है। पार्टी से बगावत करने वाले नेता एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री के तौर पर शिव सैनिक पसंद कर सकते हैं, जिससे मुख्य पार्टी की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। शिवसेना के 56 वर्षों के इतिहास में पार्टी के भीतर कई बार बगावतें हुईं हैं और पार्टी के दिग्ग्गज नेताओं छगन भुजबल (1991), नारायण राणे (2005) और राज ठाकरे (2006)ने पार्टी छोड़ी हैं, लेकिन इस बार एकनाथ शिंदे की अगुवाई में हुई बगावत ने पार्टी को पूरी तरह से हिला कर रख दिया और उद्धव ठाकरे नीत सरकार गिर गई।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जब 2014 में भारतीय जनता पार्टी ने लोकसभा का चुनाव जीता और स्वयं को हिंदुत्व के एकलौते संरक्षक के तौर पर स्थापित किया,वहीं से शिवसेना के पतन की कहानी शुरू हो जाती है। जब शिवसेना ने पुराना गठबंधन समाप्त करते हुए 2019 में कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के साथ मिलकर महा विकास आघाड़ी सरकार बनाई तो इससे भाजपा क्रोधित हुई थी। शिवसेना के गढ़ कहे जाने वाले ठाणे, कोंकण और मराठवाड़ा क्षेत्रों में बगावत से असर पड़ा है।