By नीरज कुमार दुबे | Feb 28, 2026
पश्चिम एशिया में आज घटनाक्रम ने अचानक भीषण रूप ले लिया, जब अमेरिका और इजराइल ने मिलकर ईरान पर व्यापक सैन्य अभियान शुरू किया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बड़े पैमाने पर युद्धक कार्रवाई की पुष्टि करते हुए इसे अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आवश्यक कदम बताया और कहा कि तेहरान को परमाणु हथियार क्षमता हासिल करने से रोकना अनिवार्य है।
हम आपको बता दें कि हमलों की पहली लहर में तेहरान के कई महत्वपूर्ण स्थलों पर विस्फोट हुए। ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के परिसर तथा राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन के ठिकानों को निशाना बनाए जाने की खबरें सामने आईं। हालांकि कुछ सूत्रों के अनुसार खामेनेई को पहले ही सुरक्षित स्थान पर पहुंचा दिया गया था। ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड के कई वरिष्ठ कमांडरों के मारे जाने की अपुष्ट खबरें भी आईं।
हमलों के तुरंत बाद ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए इजराइल और क्षेत्र में स्थित अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइलें दागीं। कतर की राजधानी दोहा और संयुक्त अरब अमीरात की राजधानी अबू धाबी में विस्फोटों की आवाजें सुनी गईं। बहरीन में अमेरिकी पांचवें बेड़े के सेवा केंद्र के निकट हमले की सूचना मिली, जिसके बाद जुफैर इलाके को खाली कराया गया। कुवैत ने अपनी सुरक्षा के अधिकार सुरक्षित रखने की बात कही, जबकि जॉर्डन ने दो मिसाइलें मार गिराने का दावा किया। वहीं इजराइल में आपातकाल घोषित कर दिया गया है। इस समय ईरान की ओर से इजराइल और अमेरिकी बेसों पर मिसाइल और ड्रोन हमले लगातार होने की खबरें सामने आ रही हैं जिनसे यूएई में एक व्यक्ति की मौत की खबर है जबकि अमेरिकी और इजराइली हमलों से ईरान को हुए नुकसान को देखें तो वह काफी व्यापक है।
हम आपको बता दें कि ईरान के दक्षिणी शहर मीनाब में एक विद्यालय पर हमले में 40 से ज्यादा छात्रों की मृत्यु की खबर ने हालात की गंभीरता को और बढ़ा दिया है। तेहरान में आम नागरिकों में दहशत का माहौल है, उत्तर की ओर पलायन, पेट्रोल पंपों पर लंबी कतारें और संचार बंद होने की आशंकाएं सामने आ रही हैं। इसके अलावा, इस संघर्ष का सबसे तात्कालिक प्रभाव वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी पड़ता दिख रहा है। हम आपको बता दें कि खाड़ी क्षेत्र विश्व तेल आपूर्ति का प्रमुख स्रोत है और होर्मुज जलडमरूमध्य इसकी धुरी है। यह संकरा समुद्री मार्ग ईरान और ओमान के बीच स्थित है और वैश्विक तेल तथा गैस आपूर्ति का बड़ा हिस्सा इसी से गुजरता है। यदि ईरान ने इसे अवरुद्ध किया या टैंकरों पर हमले बढ़ाए तो पूरी दुनिया में ऊर्जा संकट गहरा सकता है। पहले ही कच्चे तेल के दाम सात महीने के उच्चतम स्तर पर पहुंच चुके थे। क्षेत्रीय युद्ध की स्थिति में कीमतें और उछल सकती हैं।
भारत के लिए यह स्थिति अत्यंत चिंताजनक है। भारत विश्व के बड़े तेल आयातकों में से एक है और अपनी आवश्यकता का अधिकांश हिस्सा आयात करता है। भारत द्वारा आयातित कच्चे तेल का बड़ा भाग इसी जलडमरूमध्य से होकर आता है। कीमतों में एक डॉलर की भी वृद्धि से भारत के आयात बिल पर अरबों डॉलर का अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है। इससे महंगाई, चालू खाते का घाटा और रुपये पर दबाव बढ़ सकता है।
भारत की एक और बड़ी चिंता क्षेत्र में बसे लाखों भारतीय नागरिकों की सुरक्षा है। खाड़ी देशों में बड़ी भारतीय प्रवासी आबादी कार्यरत है। हवाई क्षेत्र बंद होने से उड़ानों पर असर पड़ा है। इंडिगो और एअर इंडिया एक्सप्रेस जैसी विमानन कंपनियों ने पश्चिम एशिया की उड़ानें अस्थायी रूप से स्थगित कर दी हैं। इजराइल का हवाई क्षेत्र बंद होने से दिल्ली तेल अवीव उड़ान को वापस लौटना पड़ा। यदि संघर्ष लंबा खिंचता है तो निकासी अभियान चलाना पड़ सकता है।
सामरिक दृष्टि से यह टकराव अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि अमेरिकी और इजराइली हमलों का उद्देश्य केवल परमाणु कार्यक्रम को रोकना न होकर शासन परिवर्तन की दिशा में है, तो यह क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को पूरी तरह बदल सकता है। ईरान लंबे समय से लेबनान, सीरिया, इराक और यमन में अपने प्रभाव के जरिए शक्ति संतुलन बनाए हुए है। अब यदि वह सीधे अमेरिकी ठिकानों पर हमले कर रहा है तो यह छाया युद्ध से खुली जंग की ओर बढ़ने का संकेत है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जिन देशों में अमेरिकी सैन्य अड्डे हैं, यदि वे भी प्रत्यक्ष रूप से युद्ध में शामिल हो जाएं तो क्या यह विश्व युद्ध जैसी स्थिति बन सकती है? खाड़ी के देश अब तक संतुलन साधने की कोशिश करते रहे हैं, परंतु यदि उनकी भूमि पर हमले जारी रहते हैं और वे सामूहिक प्रतिकार करते हैं, तो संघर्ष का दायरा तेजी से फैल सकता है। अमेरिका के साथ रक्षा समझौतों के कारण नाटो सहयोगी भी अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हो सकते हैं। वहीं रूस ने हमलों की निंदा करते हुए इसे सशस्त्र आक्रमण बताया है। इस तरह यदि प्रमुख शक्तियां अलग अलग पक्षों में खुलकर उतरती हैं तो बहुध्रुवीय टकराव की आशंका बढ़ सकती है।
हालांकि तत्काल इसे विश्व युद्ध कहना जल्दबाजी होगी, परंतु ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री मार्गों और क्षेत्रीय गठबंधनों पर पड़ने वाला प्रभाव इसे वैश्विक संकट अवश्य बना सकता है। यदि कूटनीतिक प्रयास विफल रहते हैं और होर्मुज या बाब अल मंदेब जैसे मार्ग अवरुद्ध होते हैं, तो एशिया, यूरोप और अमेरिका सभी प्रभावित होंगे। देखा जाये तो इस समय भारत के सामने संतुलित कूटनीति, ऊर्जा आपूर्ति का विविधीकरण, सामरिक भंडार का उपयोग और प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा सुनिश्चित करना सबसे बड़ी प्राथमिकताएं हैं। पश्चिम एशिया की यह ज्वाला यदि फैलती है तो इसका धुआं पूरी दुनिया को प्रभावित करेगा।