बारसूर में मामा भांजा मंदिर में दर्शन के लिए उमड़ते हैं श्रद्धालु

By कमल सिंघी | Jan 09, 2018

दंतेवाड़ा। छत्तीसगढ़ के कई क्षेत्र ऐसे हैं, जहां धार्मिक स्थलों को देखने के लिए देश-दुनिया से पर्यटक आते हैं। जगदलपुर और दंतेवाड़ा क्षेत्र में भी बारसूर की ऐतिहासिक धरोहरें कुछ ऐसी ही हैं, जिन्हें देखने के लिए हर साल दूर-दूर से बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। कोई यहां के धार्मिक स्थलों के दर्शन के लिए आते हैं, तो कोई यहां के गौरवशाली इतिहास का जीवंत नजरा देखने आते हैं। छत्तीसगढ़ के सर्वाधिक ज्ञात पुरातात्विक स्थलों में से एक है बारसूर। यहां के प्रारंभिक इतिहास के बारे में विद्वानों के बीच कोई एक मत नहीं है। कुछ का दावा है कि यह 840 ईस्वीं से पहले के गंगावंशी शासकों की राजधानी थी। अन्य यह तर्क देते हैं कि इसे नागवंशियों द्वारा बनाया गया था। जिन्होंने 10वीं, 11वीं ईस्वीं में काकतियों द्वारा विस्थापित किए जाने से पूर्व लगभग तीन शताब्दियों तक इस भूमि की अधिकतर भूमि पर राज्य किया था।

दूसरा शिव मंदिर चंद्रादित्य मंदिर से कुछ ही दूरी पर है जो अपने मंडप के कारण विख्यात है, जिसमें 32 खंभे हैं, जिन्हें चार पंक्तियों में बनाया गया है। यह बत्तीशा मंदिर के नाम से लोकप्रिय है। यहां पर यह जानना दिलचस्प है कि मंदिर में प्रयोग में लाये गए सभी खंभे (प्रत्येक की ऊंचाई दो मीटर से अधिक है) पत्थर के बने हैं। आठ मीटर चौड़े और एक मीटर ऊंचे वर्गाकार चबूतरे पर बना यह मंदिर दो एक समान गर्भगृहों की उपस्थिती के कारण अद्भुत हैं, जिनसे जुड़ा एक मात्र विशाल नंदी है।

मामा भांजा मंदिर

अन्य दो मंदिर की तुलना में यह बेहतर स्थिति में है। इसे एक अच्छी तरह सरंक्षित वक्रीय शिखर के साथ ऊपर उठाए गए ढलवा आधार पर बनाया गया है। इसके चबूतरे पर एक 13वीं शताब्दी के तेलगू शिलालेख से मंदिर निर्माण की तारीख का पता चलता है। इसके नजदीक कभी एक गणेश मंदिर रहा होगा, लेकिन आज केवल भवन के अवशेष बचे हैं। सौभाग्य से मंदिर में दो बड़ी मूर्तियां बची हैं, बड़ी लगभग 2.5 मीटर ऊंची है और इसकी परिधि पांच मीटर से अधिक है।

शास्त्रीय बारसूर शैली की विशेषता

मूर्तिकला की शास्त्रीय बारसूर शैली की विशेषता एक छोटी गर्दन और एक चोकौर और सपाट चेहरा, गोल अंग, छोटा, माथा, चपटे बाल और टोपी है। यहां तक कि कपड़े की नक्काशी इस बात का संकेत देती है कि वास्तविक जीवन में, यह शायद सूती का बना हुआ था, जो इस काल के शास्त्रीय मंदिरों में मध्यकालीन मूर्तिकला में प्रदर्शित महीन मलमल अथवा सिल्क से भिन्न था।

- कमल सिंघी

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