Nandigram Bypoll में Mamata Banerjee ने Congress उम्मीदवार को दिया समर्थन

By प्रभासाक्षी न्यूज़ डेस्क | Sep 20, 2026

(फाइल फोटो के साथ जारी) (सौगत मुखोपाध्याय) कोलकाता, 20 सितंबर पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का नंदीग्राम विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार को समर्थन देना राज्य में विपक्ष की राजनीति में नए समीकरण बनने का संकेत हो सकता है। पर्यवेक्षकों का मानना है कि जब तृणमूल कांग्रेस अपने सबसे गंभीर संगठनात्मक संकट से जूझ रही है, तब ऐसे समय में यह कदम राज्य में विपक्ष की राजनीति में बहुत मायने रखता है। बनर्जी ने कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान को समर्थन देने का फैसला ऐसे समय में किया जब उनके धड़े की उम्मीदवार संचिता प्रधान डे ने मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से कोलकाता में मुलाकात के बाद उपचुनाव से अपना नाम वापस ले लिया।

बनर्जी ने यह भी कहा था कि वह विपक्षी गठबंधन के भविष्य को लेकर बंगाल से एक संदेश देना चाहती हैं। हालांकि, यह कदम जिस समय उठाया गया है, उसके स्पष्ट रणनीतिक मायने हैं। बनर्जी के खेमे ने शुरुआत में नंदीग्राम से अपना उम्मीदवार उतारा था और उम्मीदवार के चुनाव मैदान से हटने के बाद उसने चुनाव नहीं लड़ने का फैसला किया।

पर्यवेक्षकों का कहना है कि कांग्रेस को उनका समर्थन देना भाजपा विरोधी मतों को बंटने से रोकने की कोशिश होने के साथ ही उनके खेमे के लिए असामान्य रूप से मुश्किल दौर का राजनीतिक जवाब भी है। बनर्जी की घोषणा के कुछ ही समय बाद प्रधान को 2007 के नंदीग्राम भूमि आंदोलन से जुड़े एक मामले में गिरफ्तार कर जेल भेजे जाने से इस घटनाक्रम का राजनीतिक महत्व और बढ़ गया है। बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर 1990 के दशक के आखिर में तृणमूल कांग्रेस का गठन किया था।

उन्होंने वाम मोर्चे को चुनौती देने के लिए तृणमूल कांग्रेस बनाई थी और उनका मानना था कि माकपा का विरोध करने में कांग्रेस पर्याप्त रूप से प्रभावी नहीं थी। इसके बावजूद दोनों दल किसी बड़े राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी का सामना करते समय बीच-बीच में एक साथ आते रहे हैं। बनर्जी के राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) से नाता तोड़ने के बाद दोनों दलों ने 2001 का पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव साथ मिलकर लड़ा और 2009 के लोकसभा चुनाव में भी फिर साथ आए।

यह गठबंधन 2011 में अपने चरम पर पहुंचा, जब कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस ने मिलकर पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे के 34 साल के शासन का अंत किया लेकिन बाद में नीतियों, सीट बंटवारे और राज्य सरकार के कामकाज को लेकर मतभेद बढ़ने के साथ यह साझेदारी टूट गई। पर्यवेक्षकों का कहना है कि बनर्जी का हालिया कदम उपचुनाव के सामान्य राजनीतिक गणित से कहीं अधिक महत्व रखता है। यह एक असामान्य मौका है जब उन्होंने बंगाल में भाजपा विरोधी चुनावी रणनीति के केंद्र में सार्वजनिक रूप से कांग्रेस को जगह दी है।

हालांकि, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अधीर रंजन चौधरी ने दोनों दलों के बीच तत्काल राजनीतिक नजदीकी की किसी संभावना को ज्यादा तवज्जो नहीं दी। बनर्जी के कदम पर प्रतिक्रिया देते हुए चौधरी ने कहा कि वह कांग्रेस को ‘‘गिरे हुए पत्ते की तरह कमजोर न समझें, बल्कि उसे बरगद की तरह मजबूत मानकर उसका साथ दें।’’ चौधरी ने कहा, ‘‘समर्थन कब दिया गया है, इस पर गौर किया जाना चाहिए। यह तब दिया गया जब उनकी उम्मीदवार चुनाव मैदान से हट गईं।

अब उनके पास ‘फुटबॉल खिलाड़ी’ चुनाव चिह्न है, लेकिन उनका खेल खेलने के लिए कोई खिलाड़ी नहीं बचा है।’’ उन्होंने तृणमूल कांग्रेस के नाम एवं चुनाव चिह्न को लेकर पार्टी के गुटों में जारी टकराव के बाद निर्वाचन आयोग द्वारा बनर्जी के धड़े को अस्थायी रूप से आवंटित चुनाव चिह्न का जिक्र करते हुए यह बात की। हालांकि, पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष शुभंकर सरकार की राय इससे अलग है। उन्होंने कहा, ‘‘कांग्रेस राज्य की भाजपा विरोधी और धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक ताकतों से मिलने वाले हर समर्थन का स्वागत करती है।

क्या पता कि बंगाल का यह घटनाक्रम विपक्ष को और मजबूती से एकजुट करने वाला कोई नया राजनीतिक रास्ता खोल दे।’’ कांग्रेस नेताओं ने प्रधान की गिरफ्तारी की आलोचना की है। राहुल गांधी ने इसे राजनीतिक प्रतिशोध बताते हुए कहा है कि पार्टी ‘‘लड़ेगी और जीतेगी।

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