Chai Par Sameeksha: ममता बनर्जी ने जो बोया वो काटा, MLAs के बाद MPs का विद्रोह TMC को खत्म कर देगा!

By अंकित सिंह | Jun 08, 2026

प्रभासाक्षी न्यूज़ नेटवर्क के खास साप्ताहिक कार्यक्रम चाय पर समीक्षा में इस सप्ताह के. अन्नामलाई के भाजपा से इस्तीफे, टीएमसी विभाजन और इंडिया ब्लॉक की बैठक से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की गयी। इसा दौरान प्रभासाक्षी संपादक नीरज कुमार दुबे मौजूद रहे। अन्नामलाई को लेकर नीरज दुबे ने कहा कि तमिलनाडु की राजनीति में एक नया भूचाल उस समय आ गया जब भारतीय जनता पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष के. अन्नामलाई ने पार्टी से इस्तीफा देकर अपने नए राजनीतिक आंदोलन की घोषणा कर दी। यह फैसला तमिलनाडु की जमी हुई राजनीतिक संस्कृति को चुनौती देने वाला एक बड़ा संदेश है। अन्नामलाई ने जिस साफगोई, साहस और वैचारिक दृढ़ता के साथ अपने फैसले को सामने रखा है, उसने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह अब किसी दल के सीमित दायरे में नहीं, बल्कि तमिल समाज की व्यापक आकांक्षाओं के प्रतिनिधि के रूप में उभरना चाहते हैं।

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दुबे ने कहा कि वैसे तमिलनाडु की मौजूदा राजनीति भी अन्नामलाई के लिए अवसर लेकर आई है। हालिया विधानसभा चुनावों में द्रविड दलों को झटके लगे और अभिनेता विजय की पार्टी ने अप्रत्याशित सफलता हासिल की। इससे यह स्पष्ट हो गया कि राज्य की जनता अब पारंपरिक राजनीतिक ढांचे से बाहर विकल्प तलाश रही है। अन्नामलाई का मानना है कि राष्ट्रीय दलों के लिए यहां सीमित राजनीतिक जगह है, इसलिए एक मजबूत क्षेत्रीय विकल्प ही जनता की आकांक्षाओं को सही दिशा दे सकता है। उनकी यह समझ राजनीतिक रूप से बेहद व्यावहारिक और दूरदर्शी मानी जा रही है। बहरहाल, यह स्पष्ट है कि अन्नामलाई ने केवल पार्टी नहीं छोड़ी, बल्कि तमिलनाडु की राजनीति को नई दिशा देने की चुनौती स्वीकार की है। उनकी राजनीति में साहस है, वैचारिक स्पष्टता है और बदलाव की बेचैनी भी है। 

नीरज कुमार दुबे पश्चिम बंगाल की राजनीति को लेकर कहा कि पिछले कुछ सप्ताहों के भीतर जिस तेजी से घटनाक्रम बदला है, उसने तृणमूल कांग्रेस और उसकी संस्थापक ममता बनर्जी के राजनीतिक भविष्य पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। कभी बंगाल की राजनीति पर मजबूत पकड़ रखने वाली तृणमूल कांग्रेस आज अपने सबसे बड़े संकट से गुजर रही है। विधानसभा चुनाव में भाजपा के हाथों मिली करारी हार के बाद पार्टी के भीतर लंबे समय से सुलग रहा असंतोष अब खुली बगावत में बदल चुका है। महज 13 दिनों के भीतर घटनाओं की ऐसी श्रृंखला सामने आई, जिसने 28 वर्ष पुरानी पार्टी को विभाजन की कगार पर पहुंचा दिया।

उन्होंने कहा कि तृणमूल कांग्रेस की स्थापना ममता बनर्जी ने 1998 में कांग्रेस से अलग होकर की थी। इसके बाद उन्होंने वाम मोर्चे के लंबे शासन के खिलाफ जन आंदोलन खड़ा किया और 2011 में ऐतिहासिक जीत हासिल कर बंगाल की सत्ता पर कब्जा जमाया। 2016 और 2021 के चुनावों में भी पार्टी ने शानदार प्रदर्शन किया। लेकिन 2026 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के हाथों मिली हार ने पार्टी की राजनीतिक जमीन हिला दी। सबसे बड़ा झटका यह था कि ममता बनर्जी को अपने पारंपरिक गढ़ भवानीपुर में शुभेंदु अधिकारी के खिलाफ हार का सामना करना पड़ा। इसके साथ ही विधानसभा में टीएमसी की संख्या घटकर केवल 80 विधायकों तक सिमट गई।

उन्होंने कहा कि तृणमूल कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी उसका स्पष्ट वैचारिक आधार न होना रहा है। वाम विरोध की राजनीति ने पार्टी को सत्ता तक पहुंचाया, लेकिन सत्ता मिलने के बाद संगठनात्मक एकता कमजोर पड़ती गई। अब जब चुनावी हार ने पार्टी की शक्ति कम कर दी है, तो व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं और उत्तराधिकार की लड़ाई खुलकर सामने आ गई है। फिर भी ममता बनर्जी को राजनीति से बाहर मान लेना जल्दबाजी होगी। बंगाल की राजनीति में उनका संघर्ष, जनाधार और राजनीतिक अनुभव अभी भी उन्हें एक मजबूत नेता बनाता है। लेकिन यह भी सच है कि तृणमूल कांग्रेस अब अपने इतिहास के सबसे कठिन दौर से गुजर रही है और आने वाले समय में यह तय होगा कि पार्टी इस संकट से उबर पाएगी या बंगाल की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत होगी।

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