बाज़ार की दुनिया में आदमी (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Mar 21, 2024

विकसित होती दुनिया की कुछ रिपोर्ट्स को पढ़कर लगता है कि या तो विकास नहीं हो रहा या फिर बहुत ज्यादा हो गया। बार बार लगता है विकास का फायदा कम लोगों को हुआ। गरीब होती सचाई कहती है ज्यादा लाभ अमीरों को हुआ। कमज़ोर आर्थिक स्थिति में भी उनकी दौलत ने खूब तरक्की की। गरीबों को पहले से ही गरीबी में जिए जाने के अनुभव का संबल मिला तभी ज़्यादा गरीब हो जाने की स्थिति में भी परेशान नहीं हुए। राजनीति की सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक फैक्ट्री का उत्पादन बढ़ता गया। उसमें बनाई और पकाई नई लाभकारी योजनाएं बांटने का अवसर नेताओं को मिला।    

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बाज़ार के यशस्वी प्रबंधकों ने ग्राहक के दिमाग पर भरोसा उगा कर मानो दुखों की क्यारी में दिलकश खुशबूदार फूल खिला दिए हैं। उन्होंने चौबीस घंटे मेहनत कर इंसानियत को ब्रांड का दीवाना बना दिया है।  जगमग बाज़ार में ग्राहकों का झूमना बढ़ता जा रहा है। एक तरह से नहीं कई तरह से यह ऐतिहासिक सफलता है कि बाज़ार और उसके पालक, उस्ताद विज्ञापन ने आम लोगों की सोचने समझने की शक्ति अपने नाम कर ली है। भूख, स्वास्थ्य, अशिक्षा और बेरोजगारी के मोहल्लों पर तकनीक की हुकूमत शुरू हो गई है। बेचना, खरीदना, पैसा कमाना, मानवीय और नैतिक कर्तव्य हो गया है। बढती आर्थिक असमानता समाज की रौनक बन गई है। अब इसे एक राष्ट्रीय सम्मान की तरह लिया जा रहा है। कई बार लगता है इतने विकास की ज़रूरत नहीं थी लेकिन विकास तो एक सतत प्रक्रिया है। विनाश के बाद विकास होना लाजमी है, वह बात अलग है कि ज्यादा विकास विनाश की ओर ले जाता है।

   

बाज़ार ने संतुष्टि की मार्केटिंग भी बहुत सलीके से की है। सामान मंगाने, पसंद न आए तो लौटाने, फिर मंगाने और फिर लौटाने, घर पर बैठे बैठे जितना मर्ज़ी मंगाने ने ज़िंदगी को आनंद मेले में बदल दिया है।  शरीर खुश है तो मन खुश है। ऐसे में ishthur निष्ठुर होते जा रहे समझदारों को कहां फुर्सत है कि भूख, अस्वस्थ, अशिक्षित और बेरोजगार जैसे शब्दों को सुनना या पढ़ना चाहें। बाज़ार का अमीर होकर सक्रिय बने रहना, विकास के लिए भाग्यशाली होता है तभी तो सब कुछ बेचना और खरीदना आसान रहता है। मानवीय सौहार्द, आपसी सहयोग, निश्छल प्रेम, परस्पर सदभाव की ज़रूरत वैसे भी कम होती जा रही है।  सुनियोजित शैली में सब हो रहा है। अधिक आराम और शांति से ज़िंदगी बिताने के लिए, नए रास्तों का आविष्कार किया जा रहा है। कहीं इन रास्तों के समापन पर, नया बाज़ार खुलने की इंतज़ार तो नहीं कर रहा। गरीब हो या अमीर, बाज़ार से बचना मुश्किल है।

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