पार्वती जी के कान का कर्णफूल खो गया था मणिकर्ण में

By डॉ. प्रभात कुमार सिंघल | Nov 26, 2019

मणिकर्ण नामक पवित्र तीर्थ हिमाचल में कुल्लू से लगभग 45 किमी दूर पार्वती घाटी में व्यास और पार्वती नदियों के मध्य स्थित है। मणिकर्ण का अर्थ कान का मणि यानी कर्णफूल से लिया जाता है।

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इसी स्थान पर भगवान शिव का मंदिर है। कुल्लू के राजाओं ने भगवान राम का एक मंदिर भी बनवाया था जो रघुनाथ मंदिर के नाम से जाना जाता है। यहां भगवान कृष्ण एवं विष्णु के मंदिर भी हैं। यहाँ सिखों का एक गुरुद्वारा है जो इनके धार्मिक स्थलों में विशेष महत्व रखता है। यह मणिकर्ण साहिब गुरु नानकदेव की यहां की यात्रा की स्मृति में बनाया गया था। जनम सखी और ज्ञानी ज्ञान सिंह द्वारा लिखी तवारीख गुरु खालसा में इस बात का उल्लेख है कि गुरु नानक ने भाई मरदाना और पंच प्यारों के साथ यहां की यात्रा की थी। पंजाब से बडी़ संख्या में लोग श्रद्धा के साथ यहां आते हैं। पूरे वर्ष यहां दोनों समय लंगर चलता रहता है। यहां के यह पानी संधिशोथ और इसी तरह की कई बीमारियों में फायदेमंद मन जाता है। इस स्थान के धार्मिक महत्व का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कुल्लू घाटी के अधिकतर देवता समय-समय पर अपनी सवारी के साथ यहां आते रहते हैं।

मणिकर्ण में हरिंदर पहाड़ी, पार्वती नदी, शोजा, मलन कसोल, तोशघाटी और मलाना प्रसिद्ध दर्शनीय पर्यटक स्थल हैं। ब्रह्म गंगा, नारायणपुरी है, राकसट, 16000 मीटर की कठिन चढा़ई के बाद आने वाला सुंदर स्थल पुलगा, 22 किमी दूर 8000 फुट की ऊँचाई पर रुद्रनाथ, 25 किमी दूर10000 फुट से अधिक की ऊंचाई पर स्थित खीरगंगा, 45 किमी. पर पांडव पुल दर्शनीय स्थल हैं। गर्मी में मणिकर्ण आने वाले रोमांच प्रेमी लगभग 115 किमी दूर मानतलाई तक चले जाते हैं। मानतलाई के लिए मणिकर्ण से तीन-चार दिन लग जाते हैं। सुनसान रास्ते के कारण खाने-पीने का सामान, दवाएं इत्यादि साथ ले जाना नितांत आवश्यक है। इस दुर्गम रास्ते पर मार्ग की पूरी जानकारी रखने वाले एक सही व्यक्ति को साथ होना बहुत आवश्यक है। पर्वतों से घिरी पूरी घाटी पर्वतारोहियों के लिये अच्छा अवसर प्रदान करती है।

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देश-विदेश के लाखों प्रकृति प्रेमी पर्यटक यहाँ बार-बार आते है, विशेष रूप से ऐसे पर्यटक जो चर्म रोग या गठिया जैसे रोगों से परेशान हों यहां आकर स्वास्थ्य सुख पाते हैं। खौलते पानी के चश्मे मणिकर्ण का सबसे अचरज भरा और विशिष्ट आकर्षण हैं। गर्म जल के चश्मे में श्रद्धालु यहाँ चावल ओर चने आदि कपड़े में बांध कर पानी मे उबालते हैं। प्रति वर्ष अनेक युवा स्कूटरों व मोटरसाइकिलों पर ही मणिकर्ण की यात्रा का रोमांचक अनुभव लेते हैं। मणिकर्ण में बरसात को छोड़ कर किसी भी मौसम में जाया जा सकता हैं। लेकिन जनवरी में यहां बर्फ गिर सकती है। तब ठंड कडा़के की रहती है। मार्च के बाद से मौसम थोड़ा अनुकूल होने लगता है। निकटतम रेलवे स्टेशन 258 किमी पर चंडीगढ़ एवं 285 किमी पर पठानकोट हैं। दिल्ली से भुंतर के लिए दैनिक हवाई सेवा उपलब्ध है।

डॉ. प्रभात कुमार सिंघल

लेखक एवं पत्रकार

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