By नीरज कुमार दुबे | Aug 21, 2026
मणिपुर में जनगणना से पहले एनआरसी की मांग को लेकर शुरू हुआ आंदोलन अब बड़ा रूप ले चुका है और राज्य सरकार ही नहीं बल्कि केंद्र सरकार की चिंताएं भी बढ़ती जा रही हैं। मणिपुर में बड़े प्रयासों के बाद शांति स्थापित हुई लेकिन नये आंदोलन के चलते प्रशासन के हाथ पांव फूल रहे हैं और जनगणना प्रशिक्षण का काम कुछ जिलों में रोकना पड़ गया है। देखा जाये तो मणिपुर में ‘नो एनआरसी, नो सेंसस’ का नारा अब केवल जनगणना रोकने की मांग तक सीमित नहीं रह गया है। इसके पीछे विस्थापन, जनसंख्या में बदलाव, भूमि अधिकार, पहचान और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर लंबे समय से चली आ रही चिंताएं हैं। तीन साल से अधिक समय से जातीय हिंसा की मार झेल रहे मणिपुर में जनगणना से पहले एनआरसी की मांग अब एक बड़े राजनीतिक और सामाजिक मुद्दे का रूप ले चुकी है।
इसी पृष्ठभूमि में कैंपेन फॉर जस्ट एंड फेयर डिलिमिटेशन के नेतृत्व में आंदोलन तेज हुआ। 48 घंटे के बंद के दौरान कई घाटी जिलों में सड़कें जाम की गईं, प्रदर्शन हुए और मुख्यमंत्री व गृह मंत्री के पुतले जलाए गए। छात्रों और महिलाओं की भागीदारी ने आंदोलन को व्यापक जनरूप दिया। अब सरकारी कार्यालयों के बहिष्कार का भी ऐलान किया गया है, जबकि आवश्यक सेवाओं को इससे अलग रखा गया है। बढ़ते तनाव के बीच राज्य सरकार ने शिक्षण संस्थानों को तीन दिन के लिए बंद करने का आदेश दिया है।
बताया जा रहा है कि आंदोलन की मूल मांग है कि जनगणना से पहले नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स यानी एनआरसी को लागू या अपडेट किया जाए। देखा जाये तो यहां एनआरसी और जनगणना में अंतर समझना जरूरी है। जनगणना का उद्देश्य आबादी की गणना और उसकी सामाजिक-आर्थिक जानकारी जुटाना है, जबकि एनआरसी का संबंध भारतीय नागरिकों की पहचान से है। नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 14ए और 2003 के नियम इसके कानूनी ढांचे से जुड़े हैं। आंदोलन समर्थकों का तर्क है कि पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि राज्य की वैध जनसांख्यिकीय आबादी कौन है, उसके बाद ही नई जनगणना के आंकड़ों को भविष्य के प्रशासनिक और राजनीतिक फैसलों का आधार बनाया जाए।
देखा जाये तो मणिपुर में यह मांग नई नहीं है। विधानसभा 2022 और फिर 2024 में एनआरसी लागू करने संबंधी प्रस्ताव पारित कर चुकी है। राज्य जनसंख्या आयोग का गठन भी इसी बहस की पृष्ठभूमि में हुआ। लेकिन सबसे विवादास्पद मुद्दा कट-ऑफ वर्ष का है। कई नागरिक संगठनों की मांग है कि 1951 को आधार बनाया जाए, जबकि राज्य मंत्रिमंडल ने इनर लाइन परमिट के संदर्भ में 1961 को ‘मूल निवासी’ निर्धारण का आधार स्वीकार किया था। यही अंतर अब आंदोलन की राजनीतिक धार को और तेज कर रहा है।
जनसांख्यिकीय बदलाव की आशंका के पीछे पुराने आंकड़ों का भी हवाला दिया जा रहा है। हम आपको बता दें कि 1961 में मणिपुर की दशकीय जनसंख्या वृद्धि 35.04 प्रतिशत और 1971 में 37.52 प्रतिशत रही, जबकि 2011 में यह 24.50 प्रतिशत थी। समर्थकों का कहना है कि ऐसे बदलावों की गंभीर जांच होनी चाहिए। हालांकि यह भी उतना ही जरूरी है कि जनसंख्या वृद्धि को सीधे अवैध प्रवास का प्रमाण नहीं मान लिया जाए। हर दावा तथ्यों और प्रमाणों की कसौटी पर परखा जाना चाहिए।
यहीं यह बहस सबसे संवेदनशील हो जाती है। म्यांमार सीमा से लगे मणिपुर में अवैध प्रवास का मुद्दा लंबे समय से राजनीतिक विमर्श का हिस्सा रहा है। लेकिन कुकी-जो समुदायों के म्यांमार के चिन समुदायों से जातीय संबंध भी हैं। इसलिए पूरे समुदाय को अवैध प्रवास की दृष्टि से देखना न केवल तथ्यात्मक रूप से गलत हो सकता है, बल्कि पहले से विभाजित समाज में अविश्वास को और गहरा कर सकता है। एनआरसी पर बहस प्रमाणों के आधार पर होनी चाहिए, किसी समुदाय के सामूहिक संदेहीकरण के आधार पर नहीं।
उधर, अब 2027 की जनगणना इस विवाद का तात्कालिक केंद्र बन गई है। पहले चरण में सितंबर में हाउस लिस्टिंग प्रस्तावित है, जबकि फरवरी 2027 में जनसंख्या और सामाजिक-आर्थिक विवरण जुटाए जाने हैं। इसी बीच लिलोंग के एसडीओ द्वारा जनगणना प्रशिक्षण कार्यक्रम रद्द किया जाना तनाव कम करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि जब ज्ञापन, प्रदर्शन और चेतावनियां पहले से मौजूद थीं, तब राजनीतिक संवाद पहले क्यों नहीं शुरू हुआ?
इसी बीच विभिन्न समुदायों और संगठनों के नेताओं का एक 10 सदस्यीय दल दिल्ली रवाना हुआ है, ताकि केंद्र के समक्ष एनआरसी और जनगणना का मुद्दा उठाया जा सके। दिल्ली जाना जरूरी हो सकता है, क्योंकि एनआरसी और जनगणना जैसे फैसलों में केंद्र की भूमिका निर्णायक है। लेकिन हर बार स्थानीय संकट के बाद दिल्ली की ओर देखना राजनीतिक नेतृत्व की सीमाओं को भी उजागर करता है।
देखा जाये तो जनगणना शासन, विकास और कल्याण के लिए अनिवार्य है। लेकिन यहां सवाल यह है कि क्या लंबे विस्थापन, अधूरी पुनर्वास प्रक्रिया और गहरे जनसांख्यिकीय अविश्वास के बीच की गई जनगणना मणिपुर की सामान्य सामाजिक संरचना का वास्तविक चित्र पेश कर पाएगी?
बहरहाल, सरकार को आंदोलन को केवल कानून-व्यवस्था की समस्या मानने की बजाय उसके पीछे छिपे विश्वास के संकट को समझना होगा। एक प्रशिक्षण कार्यक्रम रद्द कर देना या दिल्ली में ज्ञापन सौंप देना पर्याप्त नहीं होगा। मणिपुर को तथ्य-आधारित एनआरसी बहस, विस्थापितों की सुरक्षित वापसी, जनगणना की विश्वसनीयता और सभी समुदायों की संवैधानिक सुरक्षा पर गंभीर राजनीतिक संवाद चाहिए।
-नीरज कुमार दुबे