मथुरा और द्वारकापुरी इसलिए भगवान श्रीकृष्ण को हैं विशेष प्रिय

By शुभा दुबे | Aug 10, 2020

भगवान श्रीकृष्ण को मथुरा और द्वारकापुरी से विशेष प्रेम है। मथुरा में भगवान ने जन्म लिया, लीलाएँ दिखाईं, कंस के कुशासन से मथुरा वासियों को मुक्ति दिलाकर धर्म की स्थापना की तो द्वारकापुरी में उनकी लीला अपरमपार रही। माना जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण का वंदन करने के साथ ही यदि मनुष्य मथुरा नगरी का नाम ले ले तो उसे भगवान के नाम के उच्चारण का फल मिलता है। यदि वह मथुरा का नाम सुन ले तो श्रीकृष्ण के कथा श्रवण का फल पाता है। मथुरा का स्पर्श प्राप्त करके मनुष्य साधु संतों के स्पर्श का फल पाता है। मथुरा में रहकर किसी भी गंध को ग्रहण करने वाला मानव भगवच्चरणों पर चढ़ी हुई तुलसी के पत्र की सुगंध लेने का फल प्राप्त करता है। मथुरा का दर्शन करने वाला मानव श्रीहरि के दर्शन का फल पाता है। स्वतः किया हुआ आहार भी यहां भगवान लक्ष्मीपति के नैवेद्य−प्रसाद भक्षण का फल देता है। दोनों बांहों से वहां कोई भी कार्य करके श्रीहरि की सेवा करने का फल पाता है और वहां घूमने फिरने वाला भी पग−पग पर तीर्थयात्रा के फल का भागी होता है।

इसे भी पढ़ें: देवकी और वासुदेव के पूर्व के दो जन्मों में भी उनके पुत्र बने थे भगवान श्रीकृष्ण

द्वारकापुरी

मथुरा की ही तरह तीनों लोकों में विख्यात द्वारकापुरी भी धन्य है, जहां साक्षात् परिपूर्णम भगवान श्रीकृष्ण निवास करते हैं। द्वारकापुरी का उदय कैसे हुआ इससे संबंधित पुराणों में एक प्रसंग मिलता है। मनु के पुत्र शर्याति चक्रवर्ती सम्राट थे। उन्हें ऐसा महसूस होता था कि पूरी पृथ्वी पर उनका ही राज है और यह उन्होंने अपने बल से अर्जित की है। इस बात से जब उनके मझले पुत्र आनर्त ने नाइत्तफाकी जाहिर की और यह कहा कि सभी भूमि श्रीकृष्ण की है तो पिता शर्याति ने कहा कि जहां तक मेरा राज्य है, वहां तक की भूमि पर तुम निवास मत करो। तुमने जिन सर्वसहायक श्रीकृष्ण की आराधना की है, वे भगवान भी क्या तुम्हारे लिये कोई नई पृथ्वी दे देंगे। इस पर आनर्त ने राजा से कहा कि जहां तक पृथ्वी पर आपका राज्य है, वहां तक मेरा निवास नहीं होगा। पिता राजा शर्याति द्वारा निकाले गये आनर्त उनसे विदा लेकर समुद्र के तट पर चले गये और समुद्र की वेला में पहुंचकर दस हजार वर्षों तक तपस्या करते रहे। आनर्त की प्रेमलक्षणा भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान श्रीहरि ने उन्हें अपने स्वरूप का दर्शन कराया और वर मांगने के लिए कहा। आनर्त दोनों हाथ जोड़कर शीघ्रतापूर्वक उठे और उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण के चरणारविन्दों में प्रणाम किया। भगवान श्रीकृष्ण ने आनर्त की समस्या जानकर बैकुण्ठ से सौ योजन विशाल भूखण्ड उखाड़ मंगाया और समुद्र में सुदर्शन चक्र की नींव बनाकर उसी के ऊपर उस भूखण्ड को स्थापित किया। राजा आनर्त ने एक लाख वर्षों तक पुत्र−पौत्रों से संपन्न हो वहां राज्य किया।

-शुभा दुबे

प्रमुख खबरें

केजरीवाल के शीशमहल को गेस्ट हाउस बनाने की तैयारी, आम जनता के लिए भी खुल सकते हैं दरवाजे: सूत्र

India vs England 3rd T20 Highlights | आर्चर-टंग की रफ्तार के आगे ढेर हुए आईपीएल के सूरमा, तीसरे टी20 में इंग्लैंड ने भारत को 125 रनों से रौंदा

Love Horoscope For 8 July 2026 | आज का प्रेम राशिफल 8 जुलाई 2026 | प्रेमियों के लिए कैसा रहेगा आज का दिन

निज्जर हत्याकांड में सबसे बड़ा खुलासा: अमेरिकी अदालत में लॉरेंस बिश्नोई और गोल्डी बराड़ पर आरोप तय, ऑपरेशन हार्डबॉ के तहत दुनिया भर में गिरफ्तारियां