बाटला मुठभेड़ मामला कांग्रेस के लिए बोतल में बंद जिन्न है, कभी ढक्कन दिग्विजय खोलते हैं तो कभी तौकीर रजा

By नीरज कुमार दुबे | Jan 19, 2022

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों से पहले बाटला हाउस मुठभेड़ का मुद्दा एक बार फिर गरमा गया है। इस मुद्दे को उठाते हुए बरेलवी मुसलमानों के धार्मिक गुरु और इत्तेहाद-ए-मिल्लत काउंसिल (आईएमसी) के अध्यक्ष मौलाना तौकीर रजा खां ने कहा है कि बाटला हाउस मुठभेड़ में मारे गये युवक आतंकवादी नहीं बल्कि शहीद थे। यही नहीं उन्होंने शहीद इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा के बारे में कह दिया कि पुलिस ने उनकी हत्या की थी। तौकीर रजा खां ने जो बयान दिया है उससे कांग्रेस को कितना सियासी फायदा होगा या नुकसान यह तो समय ही बतायेगा लेकिन शहीद मोहन चंद शर्मा की शहादत का अपमान करके तौकीर रजा खां ने अक्षम्य अपराध किया है। धर्म की आड़ में सियासत कर रहे लोगों को यह समझना होगा कि जब कोई जवान शहादत देता है तो यह शहादत सिर्फ उस व्यक्ति ने नहीं दी होती। शहादत उनके परिवारों ने भी दी होती है।

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जहां तक बाटला मुठभेड़ मामले की बात है तो कांग्रेस ने इसे 'बोतल में बंद जिन्न' की तरह रखा हुआ है। कांग्रेस कभी इस बोतल का ढक्कन दिग्विजय सिंह से खुलवाती है तो कभी तौकीर रजा खां जैसे लोगों से। जनता यह जानना चाहती है कि जिस बाटला मुठभेड़ को तत्कालीन सरकार के अलावा तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने असली बताया हो और अदालतों ने जिसकी जांच की मांग खारिज कर दी हो, उसके ‘फर्जी’ होने की बात कांग्रेस और उसके समर्थक नेता या मौलवी आखिर किस विशेषज्ञता के आधार पर कह रहे हैं? तौकीर रजा खां ने उत्तर प्रदेश और पंजाब समेत पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस प्रत्याशियों के समर्थन का ऐलान किया है इसलिए उनके बयानों पर कांग्रेस को अपना रुख स्पष्ट करना ही होगा। अपने धार्मिक भाषणों से ज्यादा विवादित बयान देने के लिए मशहूर मौलाना तौकीर रजा खां कई बार हिंदुओं के खिलाफ बयानबाजी कर चुके हैं और नफरती भाषण देते रहे हैं इसलिए चुनावों के समय उनके विवादित बयानों पर चुनाव आयोग को भी संज्ञान लेना चाहिए।

जहाँ तक विवादित लोगों और संदिग्ध संगठनों से कांग्रेस के प्रेम का इतिहास है तो आपको बता दें कि वर्तमान कांग्रेस नेतृत्व ने अनुभवी नेताओं की बार-बार चेतावनी के बावजूद पश्चिम बंगाल में इंडियन सेक्युलर फ्रंट (ISF) और असम में एआईयूडीएफ (AIUDF) जैसे साम्प्रदायिक दलों से गठबंधन किया था। यही नहीं केरल में भी जमात-ए-इस्लामी के राजनीतिक मोर्चे वेलफेयर पार्टी ऑफ इंडिया के साथ कांग्रेस ने निकाय चुनावों में समझौता कर सबको चौंका दिया था। सत्ता पाने की बेताबी में कांग्रेस ने आईएसएफ, एआईयूडीएफ और वेलफेयर पार्टी से गठबंधन कर इन्हें धर्मनिरपेक्ष दल होने का तमगा प्रदान करने में एक पल की भी देरी नहीं लगाई थी लेकिन चुनाव परिणाम दर्शाते हैं कि कांग्रेस को ऐसे दलों से गठबंधन का कोई फायदा नहीं हुआ। यहाँ यह भ काबिलेगौर है कि चुनावों से पहले तो कांग्रेस ऐसे लोगों का साथ ले लेती है लेकिन चुनावों के बाद इन्हें बाहर का रास्ता भी दिखा देती है। विधानसभा चुनावों के बाद कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल में इंडियन सेक्युलर फ्रंट, असम में एआईयूडीएफ और केरल में वेलफेयर पार्टी से पीछा छुड़ा लिया था। ऐसे में अब देखना होगा कि तौकीर रजा खां को कब तक कांग्रेस अपने साथ रखती है।

-नीरज कुमार दुबे

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