31 अगस्त को जिनपिंग से मुलाकात, 1 सितंबर को पुतिन संग बात, ट्रंप की वजह से लगता है ट्रोइका बन ही जाएगा

By अभिनय आकाश | Aug 28, 2025

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 31 अगस्त को चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और 1 सितंबर, 2025 को रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ उच्चस्तरीय द्विपक्षीय बैठकें करेंगे। ये महत्वपूर्ण वार्ताएँ चीन में शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन के दौरान होंगी। ये चर्चाएँ भारत और अमेरिका के बीच एक महत्वपूर्ण टैरिफ विवाद के बीच हो रही हैं। ये एक ऐसा मौका होगा जब तीनों देशों के राष्ट्राध्यक्ष एक लंबे अर्से के बाद साथ होंगे। ऐसे में सवाल है कि क्या तीनों देशों के बीच डायलॉग के एक पुराने मेकेनिजम आरआईसी (रूस-भारत-चीन) को फिर से जिंदा करने पर बात हो सकती है?

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चीन की यह यात्रा दो देशों की यात्रा का हिस्सा है जिसमें जापान में एक पड़ाव भी शामिल है। इन बैठकों का संदर्भ भारत-चीन संबंधों को बेहतर बनाने के लिए चल रहे प्रयासों से जुड़ा है, जिसकी पहचान 3,488 किलोमीटर लंबी अनिर्धारित सीमा से है और रूस के साथ दशकों पुरानी रणनीतिक साझेदारी को मज़बूत करना है। एक केंद्रीय विषय भारत का विदेश नीति दृष्टिकोण है, जैसा कि एक वक्ता ने कहा कि जहाँ तक विदेश नीति का सवाल है, भारत ने हमेशा रणनीतिक स्वायत्तता का प्रयोग किया है। यूएस टैरिफ के खिलाफ न सिर्फ चीन, रूस, बल्कि ब्राजील के राष्ट्रपति जिस तरह से सामने आए उसने ब्रिक्स के देशों के विरोध को आरआईसी मेकेनिजम के जरिए रखने की भी एक संभावना को सामने रखा है। हाल के वक्त मे भारत की ओर से आरआईसी मैकेनिजम को लेकर कोई ठोस प्रतिबद्धता दिखी नही है। 

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साथ ही शांति की कथित कोशिशों को लेकर अमेरिका की भूमिका के चलते फिलहाल रूस भी यूएस के खिलाफ पहले जैसा आक्रामक रुख दिखाने से परहेज करेगा। चीन का मानना है कि भारत, रूस और चीन ऐसी तीन महाशक्तियां हैं जो दोबारा एक हो गई तो नाटो का नक्शा बदल सकती हैं। लेकिन इस संगठन को दोबारा जिंदा करने के लिए भारत हां कह दे। इस संगठन का नाम रिक ट्राइका है। रूस ने कहा था कि हम भारत और चीन के साथ मिलकर आरआईसी ट्राइका गठबंधन को दोबारा शुरू करना चाहते हैं। 

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आरआईसी ट्रोइका कैसे बना?

पूर्व रूसी पीएम प्रिमकोव ने सबसे पहले 1998 में इस फोरम के विचार को प्रस्तावित किया था, लेकिन ये साल 2001 में ही अस्तित्व में आया था। दूसरे बहुपक्षीय मंचों की ही तरह ये फोरम भी तीनों में से हर देश को अपनी विदेश नीति को ज्यादा अच्छे से समझाने का मौका देता है। हालांकि भारत और चीन के बीच विश्वास कायम करने को लेकर ये फोरम ज्यादा कामयाब नहीं रहा है।


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