अपने देश की याद (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Mar 04, 2024

हम जब भी विदेश जाते हैं तो अच्छा लगता है। कुछ दिन मन मर्ज़ी का खाओ, तन मर्ज़ी का पहनो, पिओ, घूमो फिरो और कुछ दिन बाद फिर अपनी रोज़ मर्रा की रूटीन में वापिस। फिर वही ट्रैफिक, धूल मिटटी, चीखना, मारना, पीटना, धर्म के खुशबूदार कांटे और राजनीति के रंगीन सूखे फूल। कभी कभार विदेश में ज़्यादा दिन रहने का मौका मिलता है तो कुछ दिन तक तो वहां ट्रैफिक का अनुशासन अच्छा लगता है। सड़क, गली, बाज़ार में कहीं भी जाओ, कोई हॉर्न नहीं बजा रहा होता। अगर कोई बजाए तो उसे सभ्य नहीं माना जाता। हर जगह सब ‘गिव वे’ नियम को मानते हुए दूसरों को पहले जाने देते हैं।

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हम कहने लगते हैं कि अपना देश कितना अच्छा है, कितने मज़े हैं। जितना मर्ज़ी स्पीड से चलाओ जहां चाहे पार्क कर दो । चाहे किसी और की गाड़ी के पीछे खडी कर दो। जिस मर्ज़ी गाड़ी को ठोक दो और निकल लो। छोटी सी गाड़ी में सवारियों की भीड़ बिठा लो। विदेश में तो बच्चे की सीट भी लेनी पड़ती है। वैसे तो हर कहीं पुलिस नज़र नहीं आती लेकिन तंत्र इतना कुशल और मजबूत है कि कोई दुर्धटना हो जाए तो पुलिस पहुंचने में देर नहीं लगाती। इस मोड़ पर भी अपने देश की याद आती है। अपने देश की राजनीतिक व्यवस्था में फंसी पुलिस को समाज के लिए ज़्यादा समय नहीं मिलता। देश में ‘गिव वे’ लागू नहीं होता बल्कि ‘टेक वे’ लागू होता है जो स्वार्थ जैसी सुविधा देता है। जिसके तहत हम अपनी किसी भी किस्म की गाड़ी निकाल लेते हैं। अपने देश लौटते ही उसी गली सड़ी व्यवस्था का हिस्सा हो जाते हैं क्यूंकि सुव्यवस्था  की बात करेंगे तो फंसे रह जाएंगे।

- संतोष उत्सुक

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