By संतोष उत्सुक | Jan 30, 2025
किसी युग में बंदर सिर्फ जंगली और पहाडी क्षेत्रों में रहा करते थे। वहां काफी हरियाली होती थी, उनके खाने के लिए कंद, मूल, फल आसानी से उपलब्ध हो जाया करते थे। शहर कम थे उनमें आबादी भी कम थी। जैसे जैसे समझदार इंसानों ने जंगलों को जड़ों से उखाड़ कर बस्तियां बसा दी तो बेचारे होते बंदरों ने शहरों में आना जाना और बसना शुरू कर दिया। हिम्मत कर, दिल्ली के प्रसिद्ध हस्पताल एम्स के परिसर में भी पहुंच गए। खैर...
ऐसे में स्थिति का ईमानदारी से विश्लेषण किया जाए तो लगता है बापू के बंदरों के संदेश, बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो और बुरा मत कहो संजीदगी से लागू हैं। सामाजिक, धार्मिक व राजनीतिक नायकों से मिली प्रेरणा के कारण अधिकांश लोगों को अब बुरा नहीं दिखता। इस तरह पहले बंदर का सन्देश सफल है। बुरा सुनने से बुरे बुरे ख्याल दिल और दिमाग में आएंगे, परेशानी बढ़ेगी इसलिए कोई बुरा सुनने को तैयार नहीं है। जान पहचान वाले को भी कुछ बुरा होता दिखाओ तो कंधे उचकाकर कहेगा, हमने तुमने क्या लेना। दिल, दिमाग, जिस्म और ज़िंदगी हिला देने वाला संगीत सुनो और मस्त रहो। गर्व की बात है कि बापू के दूसरे बंदर का उद्देश्य भी पूरा हो रहा है।
तीसरा बंदर भी अपना सन्देश देने में पूरी तरह कामयाब है और समाज ने अपनाया भी। बुरा कहना सचमुच बुरा है। बुरा तो छोडो अब तो सोच समझ कर कहने का ज़माना है। अच्छा, सही या उचित कहना परेशान कर सकता है। अच्छे और बुरे में फर्क नहीं है। बुरा देखना, बुरा सुनना, बुरा कहना लोकतंत्र के हिसाब से अनैतिक भी है। इस सन्दर्भ में व्यावहारिक पैकेज आसानी से उपलब्ध है।
सब सुनो, सब कहो और सब देखो और बेशर्मी से हंसते रहो। कभी बोलो तो बोलो, हमने कुछ नहीं देखा, सुना और कहा। सबसे सुरक्षात्मक जवाब रहेगा, हमें नहीं पता। तीनों बंदरों के संदेश हमारे रोम रोम में रचे हैं। वैसे, बंदरों की मूर्ति को भूल जाने और समाज में दहशत फैला रहे असली बंदरों से निबटना ज्यादा ज़रूरी है।
- संतोष उत्सुक