Mirwaiz Umar Farooq ने फिर दिखाई पाकिस्तान परस्ती, पुराने और ताजा बयानों को जानकर दंग रहे जाएंगे

By नीरज कुमार दुबे | Jul 01, 2026

कश्मीर के अलगाववादी नेता और धर्मगुरु मीरवाइज उमर फारूक ने एक बार फिर भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत की वकालत करते हुए कहा है कि दोनों देशों के बीच दोस्ती और संवाद ही कश्मीर समेत सभी लंबित विवादों का समाधान है। श्रीनगर में संवाददाताओं से बातचीत के दौरान मीरवाइज ने भारत और पाकिस्तान के नेतृत्व से वार्ता की मेज पर लौटने की अपील की और कहा कि युद्ध किसी समस्या का हल नहीं होता, बल्कि बातचीत के जरिये ही रास्ता निकलता है। हालांकि मीरवाइज के इन बयानों ने एक बार फिर उनकी सोच और पाकिस्तान के प्रति उनके नरम रुख को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

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उन्होंने यह भी कहा कि भारत और पाकिस्तान के बीच दोस्ती कश्मीर विवाद समेत लंबे समय से चले आ रहे मुद्दों को सुलझाने का सबसे अच्छा रास्ता है। मीरवाइज ने उम्मीद जताई कि भारत, पाकिस्तान और कश्मीर का नेतृत्व शांति और वार्ता की दिशा में आगे बढ़ेगा। इसके साथ ही उन्होंने जम्मू-कश्मीर में विभिन्न मुस्लिम संप्रदायों के बीच एकता की जरूरत पर भी बल दिया और कहा कि मतभेदों को बातचीत से सुलझाया जाना चाहिए।

लेकिन मीरवाइज के इन बयानों के साथ उनका पुराना रिकॉर्ड भी चर्चा में आ गया है। वर्षों पहले कश्मीर में हिंसक अशांति के दौरान मीरवाइज ने भारत सरकार के उस आरोप को सिरे से खारिज कर दिया था जिसमें पाकिस्तान पर घाटी में आतंकवाद और हिंसा को बढ़ावा देने का आरोप लगाया गया था। उस समय उन्होंने कहा था कि कश्मीर में चल रहा आंदोलन पूरी तरह स्थानीय और पवित्र संघर्ष है तथा भारत द्वारा पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराना एक घिसा पिटा प्रचार है। उन्होंने तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री की टिप्पणियों को महत्वहीन बताते हुए भारत सरकार की आलोचना की थी।

यही नहीं, उस दौर में जब पाकिस्तान समर्थक आतंकी बुरहान वानी के मारे जाने के बाद घाटी में हिंसा भड़की हुई थी और अनेक लोगों की जान गई थी, तब भी मीरवाइज का रुख सुरक्षा बलों के खिलाफ अधिक दिखाई दिया था। उन्होंने सुरक्षा बलों की कार्रवाई को अमानवीय बताते हुए भारत को कठघरे में खड़ा किया था, लेकिन पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद और सीमा पार से फैलाए जा रहे आतंकवाद पर उन्होंने कभी खुलकर सवाल नहीं उठाए।

यही वजह है कि मीरवाइज के ताजा बयान को लेकर राजनीतिक और सामाजिक हलकों में बहस तेज हो गई है। आलोचकों का कहना है कि मीरवाइज हर बार भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत की बात तो करते हैं, लेकिन पाकिस्तान की भूमिका, सीमा पार आतंकवाद और कश्मीर में हिंसा को हवा देने वाले तत्वों पर चुप्पी साध लेते हैं। सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या उनकी सोच वास्तव में शांति और विकास के लिए है या फिर वह लगातार पाकिस्तान के पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश करते रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत और पाकिस्तान के बीच संबंधों में सुधार की बात करना अलग विषय है, लेकिन आतंकवाद और अलगाववाद पर स्पष्ट रुख लेना भी उतना ही जरूरी है। भारत लगातार यह कहता रहा है कि बातचीत और आतंकवाद साथ-साथ नहीं चल सकते। ऐसे में मीरवाइज की ओर से केवल वार्ता की वकालत करना और पाकिस्तान की भूमिका पर मौन रहना उनकी मंशा पर सवाल खड़े करता है। मीरवाइज उमर फारूक के हालिया और पुराने बयानों को साथ रखकर देखा जाए तो यह बहस स्वाभाविक है कि आखिर उनका झुकाव किस दिशा में है और क्या उनकी राजनीति वास्तव में कश्मीर के लोगों के हित में है या फिर वह वर्षों से पाकिस्तान समर्थक सोच को ही अलग अलग रूपों में आगे बढ़ाते रहे हैं।

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