Myanmar President Min Aung Hlaing India Visit Analysis: PM Modi की बड़ी रणनीतिक जीत! China को मिला करारा जवाब

By नीरज कुमार दुबे | Jun 01, 2026

भारत और म्यांमार के बीच संबंधों को नई रणनीतिक धार देने वाली उच्चस्तरीय वार्ता ने दक्षिण पूर्व एशिया की बदलती भू राजनीतिक तस्वीर में बड़ा संदेश दिया है। म्यांमार के राष्ट्रपति यू मिन आंग ह्लाइंग ने राष्ट्रपति बनने के बाद अपनी पहली विदेश यात्रा के लिए भारत को चुनकर साफ संकेत दिया कि वह चीन की बढ़ती पकड़ से संतुलन बनाने के लिए नई दिल्ली के साथ संबंधों को प्राथमिकता देना चाहते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि ह्लाइंग ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को स्पष्ट आश्वासन दिया कि म्यांमार की धरती का उपयोग भारत विरोधी गतिविधियों के लिए नहीं होने दिया जाएगा। यह संदेश केवल चीन के लिए ही नहीं बल्कि म्यांमार में सक्रिय उन सशस्त्र गुटों के लिए भी था जो लंबे समय से भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में अशांति फैलाने की कोशिश करते रहे हैं। इस वार्ता के जरिए भारत ने म्यांमार में चीन के बढ़ते प्रभाव को चुनौती देते हुए यह दिखा दिया कि क्षेत्रीय सुरक्षा, सीमा प्रबंधन और सामरिक साझेदारी के मामले में नई दिल्ली अब अधिक आक्रामक और निर्णायक भूमिका निभा रही है।

दोनों नेताओं ने व्यापार, निवेश, संपर्क, सुरक्षा, क्षमता निर्माण और सीमा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर भी सहमति व्यक्त की। विदेश मंत्रालय ने बताया कि प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भारत म्यांमार का विश्वसनीय पड़ोसी, भरोसेमंद सहयोगी और संकट के समय सबसे पहले सहायता पहुंचाने वाला देश बना रहेगा। यह दृष्टिकोण भारत की ‘पड़ोसी प्रथम’, ‘एक्ट ईस्ट’ और ‘महासागर’ नीति के अनुरूप है।

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वार्ता में सुरक्षा सहयोग सबसे महत्वपूर्ण विषयों में शामिल रहा। म्यांमार के राष्ट्रपति ने भारत को आश्वासन दिया कि उनकी भूमि का उपयोग भारत विरोधी गतिविधियों के लिए नहीं होने दिया जाएगा। यह आश्वासन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत और म्यांमार के बीच लगभग सोलह सौ चालीस किलोमीटर लंबी सीमा है, जो अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर और मिजोरम जैसे संवेदनशील पूर्वोत्तर राज्यों से जुड़ी हुई है। हम आपको बता दें कि हाल के वर्षों में म्यांमार के भीतर अस्थिरता, सशस्त्र समूहों की गतिविधियां, अवैध तस्करी और सीमा पार घुसपैठ भारत की सुरक्षा चिंताओं को बढ़ाती रही हैं। विशेष रूप से मणिपुर में जातीय तनाव और हिंसा के बाद सीमा प्रबंधन का महत्व और बढ़ गया है।

भारत और म्यांमार के बीच रक्षा सहयोग का केंद्र प्रशिक्षण, क्षमता निर्माण और संस्थागत विकास रहा है। विदेश सचिव ने कहा कि म्यांमार के सैनिकों को संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों से जुड़े प्रशिक्षण भी दिए जाते हैं। साथ ही दोनों देशों ने संपर्क परियोजनाओं को तेजी से पूरा करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। विशेष रूप से कलादान बहु माध्यम पारगमन परिवहन परियोजना को रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस परियोजना के माध्यम से भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को म्यांमार के रास्ते दक्षिण पूर्व एशिया से जोड़ा जाएगा। इससे न केवल व्यापार और आर्थिक गतिविधियों को गति मिलेगी, बल्कि पूर्वोत्तर भारत का रणनीतिक महत्व भी बढ़ेगा। यह परियोजना भारत की ‘एक्ट ईस्ट’ नीति का प्रमुख आधार मानी जाती है।

देखा जाये तो इस पूरी वार्ता का एक महत्वपूर्ण पहलू चीन के बढ़ते प्रभाव की पृष्ठभूमि भी है। दक्षिण पूर्व एशिया में चीन लगातार आर्थिक और सामरिक विस्तार कर रहा है। म्यांमार में भी चीन की बड़ी निवेश परियोजनाएं और बंदरगाह विकास योजनाएं चल रही हैं। ऐसे में भारत म्यांमार के साथ संबंधों को मजबूत कर क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखना चाहता है। भारत के लिए म्यांमार केवल पड़ोसी देश नहीं बल्कि पूर्वोत्तर भारत को दक्षिण पूर्व एशिया से जोड़ने वाला सामरिक द्वार है। इसलिए नई दिल्ली इस संबंध को आर्थिक, राजनीतिक और सुरक्षा तीनों स्तरों पर मजबूत करने की कोशिश कर रही है। प्रधानमंत्री मोदी ने म्यांमार में शांति, स्थिरता और समावेशी संवाद के समर्थन की भी बात कही। भारत ने संघीय शासन व्यवस्था और आर्थिक विकास के अपने अनुभव साझा करने की पेशकश की। यह संकेत देता है कि भारत म्यांमार में स्थिर राजनीतिक व्यवस्था और दीर्घकालिक शांति को क्षेत्रीय स्थिरता के लिए आवश्यक मानता है।

हम आपको यह भी बता दें कि म्यांमार के राष्ट्रपति यू मिन आंग ह्लाइंग ने अपनी भारत यात्रा के दौरान विदेश मंत्री एस जयशंकर और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल से भी महत्वपूर्ण मुलाकात की। इन बैठकों में सीमा सुरक्षा, पूर्वोत्तर क्षेत्र में सक्रिय उग्रवादी गुटों की गतिविधियां, अवैध हथियार और नशीले पदार्थों की तस्करी, समुद्री सुरक्षा तथा क्षेत्रीय स्थिरता जैसे मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई। भारत ने साफ किया कि म्यांमार की स्थिरता और वहां शांति बहाली भारत की सुरक्षा से सीधे जुड़ी हुई है। अजित डोभाल के साथ हुई बातचीत में सामरिक सहयोग, खुफिया समन्वय और सीमा पार आतंकी नेटवर्क पर निगरानी मजबूत करने पर विशेष जोर दिया गया। विदेश मंत्री एस जयशंकर के साथ बैठक में व्यापार, संपर्क परियोजनाओं, ऊर्जा सहयोग और पूर्वोत्तर भारत को दक्षिण पूर्व एशिया से जोड़ने वाली योजनाओं को तेजी से आगे बढ़ाने पर सहमति बनी।

देखा जाये तो म्यांमार के राष्ट्रपति की यह यात्रा ऐसे समय में हुई है जब पूरा क्षेत्र भू राजनीतिक प्रतिस्पर्धा, आपूर्ति श्रृंखला संकट और सुरक्षा चुनौतियों के दौर से गुजर रहा है। इस यात्रा ने स्पष्ट किया है कि भारत और म्यांमार अपने संबंधों को केवल पारंपरिक पड़ोसी संबंधों तक सीमित नहीं रखना चाहते, बल्कि उन्हें व्यापक रणनीतिक साझेदारी में बदलना चाहते हैं। दुर्लभ खनिजों से लेकर सीमा सुरक्षा और संपर्क परियोजनाओं तक, दोनों देशों की बढ़ती निकटता आने वाले समय में दक्षिण एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया की राजनीति पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकती है।

कुल मिलाकर म्यांमार के साथ यह पूरी कूटनीतिक पहल मोदी सरकार की सक्रिय और दूरदर्शी विदेश नीति का मजबूत उदाहरण बनकर सामने आई है। ऐसे समय में जब चीन दक्षिण पूर्व एशिया में अपना प्रभाव तेजी से बढ़ा रहा है, भारत ने म्यांमार के साथ सामरिक, आर्थिक और सुरक्षा संबंधों को नई मजबूती देकर यह स्पष्ट कर दिया है कि वह क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखने में माहिर है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में भारत ने एक ओर जहां अपने पूर्वोत्तर की सुरक्षा चिंताओं को मजबूती से उठाया, वहीं दूसरी ओर संपर्क परियोजनाओं, व्यापार और रणनीतिक साझेदारी के जरिए म्यांमार को भरोसेमंद सहयोग का संदेश भी दिया। यह कूटनीतिक सफलता केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे भारत की ‘एक्ट ईस्ट’ नीति, क्षेत्रीय सुरक्षा रणनीति और एशिया में बढ़ती वैश्विक प्रतिस्पर्धा के बीच उसकी मजबूत होती भूमिका भी साफ दिखाई देती है।

-नीरज कुमार दुबे

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