मेजर ध्यानचंद की अनदेखी बंद हो, यह महान खिलाड़ी भारत रत्न का हकदार

By युद्धवीर सिंह लांबा | Aug 28, 2019

‘आज शिद्दत से करो कोशिश चिराग जलाने की, कौन जाने तुम्हीं से कल रोशन, सारा जहां हो’ 

 

किसी शायर के कहे प्रसिद्ध शेर की उपरोक्त पंक्तियाँ किसी भी व्यक्ति को अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए जोश पैदा करती हैं। कहते हैं प्रतिभा किसी की मोहताज नहीं होती है। मेजर ध्यानचंद ने अपने शानदार खेल की बदौलत भारत को तीन बार ओलंपिक में गोल्ड मेडल दिलाकर अपना लोहा मनवाया था। कहा जाता है कि मेजर ध्यानचंद के जैसा हॉकी खिलाड़ी आज तक कोई नहीं है। मेजर ध्यानचंद को फुटबॉल में पेले और क्रिकेट में ब्रैडमैन के बराबर माना जाता है।

 

अखंड भारत देश हॉकी के जादूगर' कहे जाने वाले मेजर ध्यानचंद की 114वीं जयंती देश 29 अगस्त को मना रहा है। मेजर ध्यानचंद के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए उनके जन्मदिन 29 अगस्त को हर वर्ष भारत में राष्ट्रीय खेल दिवस के रूप में मनाया जाता है।  

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भारत को तीन बार ओलंपिक में गोल्ड मेडल दिलाने वाले हॉकी के जादूगर ध्यानचंद को आखिर कब तक भारत रत्न से नजरअंदाज किया जाएगा ? मेजर ध्यानचंद जिन्होंने गुलामी के दौर में खेल के क्षेत्र में देश का नाम दुनिया भर में रोशन किया, जिसने देश को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई थी, उसी ध्यानचंद को भारत रत्न ना देकर सरकारें बार-बार उन्हें नजरअंदाज कर रही हैं। सवाल उठता है कि अपने शानदार खेल की बदौलत 1928, 1932 और 1936 में ओलंपिक स्वर्ण पदक जीतकर भारत को पूरी दुनिया में गौरवान्वित करने वाले मेजर ध्यानचंद की भारत रत्न के लिए लगातार अनदेखी करना क्या उचित है?

 

यह मेजर ध्यानचंद के साथ मजाक के अतिरिक्त और कुछ नहीं कि तत्कालीन मनमोहन सरकार ने 2011 में संसद के 82 सदस्यों की मांग ठुकरा दी थी, जिन्होंने 'भारत रत्न' के लिए मेजर ध्यानचंद के नाम की सिफारिश की थी।

 

भारत रत्न भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है और इस सम्मान की स्थापना 2 जनवरी 1954 को भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद द्वारा की गई थी। अब तक 48 हस्तियों को भारत रत्न सम्मान दिया जा चुका है। एक वर्ष में अधिकतम तीन व्यक्तियों को ही भारत रत्न दिया जा सकता है। खिलाड़ियों को 'भारत रत्न' से सम्मानित किये जाने के लिए साल 2013 में ही भारत रत्न की पात्रता के मानदंड में संशोधन किया गया।

 

24 साल के कॅरियर के बाद सचिन तेंडुलकर को मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम पर 16 नवंबर 2013 में क्रिकेट से संन्यास लेने के बाद तत्कालीन मनमोहन सरकार ने सचिन तेंडुलकर की लोकप्रियता को भुनाने के लिए भारत रत्न देने की सारी औपचारिकता महज 24 घंटों में पूरी कर ली थी।

 

जदयू नेता शिवानंद तिवारी ने सचिन को भारत रत्न देने की घोषणा पर सवालिया निशान लगाते हुए कहा था कि ध्यानचंद को यह पुरस्कार देने की घोषणा क्यों नहीं की गई जबकि उनकी उपलब्धियां कहीं ज्यादा हैं। दरअसल ऐसा करके भारत रत्न को ही मजाक बना दिया गया है। अब इस पुरस्कार का कोई महत्व नहीं रह गया है।'' उन्होंने कहा था, ''सचिन तेंदुलकर ने कोई मुफ्त में क्रिकेट नहीं खेला है। उन्होंने इसी खेल से करोड़ों रुपये कमाए हैं।' 

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पूर्व हॉकी कप्तान दिलिप टिर्की ने कहा था, ‘बहुत दुख होता है कि हमारे महान खिलाड़ी के योगदान को भुला दिया गया। अभी तक ध्यानचंद के नाम पर ही विचार नहीं किया गया, सिर्फ हॉकी जगत ही नहीं बल्कि पूरे देश की यह मांग है कि उन्हें भारत रत्न दिया जाना चाहिए।’

 

हॉकी के पूर्व ओलंपियन असलम शेर खान ने कहा था कि खेलों में सबसे पहले हॉकी और हॉकी में भी सबसे पहले ध्यानचंद को यह पुरस्कार मिलना चाहिये था। उन्होंने कहा था, ‘‘यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जिस खेल ने आजादी से पहले और बाद में भी भारत को पहचान दिलाई, उसे और उसके सबसे बड़े खिलाड़ी को इस सम्मान के काबिल नहीं समझा जा रहा है। सरकार कोई भी हो, उन्हें यह सम्मान नहीं दे रही है।’’

 

1936 में बर्लिन में हॉकी ओलंपिक का फाइनल मैच भारत और जर्मनी के बीच चल रहा था। जर्मन तानाशाह हिटलर भी मैच देख रहे थे। भारत ने उस मैच में जर्मनी को 8-1 से रौंद डाला। मैच खत्म होने के बाद हिटलर ने ध्यानचंद के खेल से प्रभावित होकर जर्मनी की नागरिकता के साथ जर्मन सेना में कर्नल बनाने तक प्रस्ताव दे दिया हालांकि ध्यानचंद ने इस प्रस्ताव को बड़ी विनम्रता के साथ यह कहकर ठुकरा दिया, ''मैंने भारत का नमक खाया है, मैं भारत के लिए ही खेलूंगा।  

 

70वें गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर नरेंद्र मोदी सरकार ने भूपेन हजारिका, नानाजी देशमुख और कांग्रेस के दिग्गज नेता रहे पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को भारत रत्न से सम्मानित करने की घोषणा की थी। भारत रत्न देने पर आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने ट्वीट में लिखा था, 'भाजपा की भारत रत्न योजना 'एक बार संघ की शाखा में जाओ भारत का रत्न बन जाओ' मज़ाक़ बना दिया भारत रत्न का।'  

 

ध्यानचंद ने तीन ओलंपिक खेलों में भारत का प्रतिनिधित्व किया और तीनों बार देश को स्वर्ण पदक दिलाया। तीन ओलंपिक (1928, 1932 और 1936) में भारत को स्वर्ण पदक दिलाने वाले ध्यानचंद के नाम की अनुशंसा यूपीए सरकार में खेल मंत्री रहे अजय माकन और भाजपा सरकार में खेल मंत्री रहे विजय गोयल ने 2017 में की थी। 

 

पिछले काफी लंबे समय से पद्मभूषण से सम्मानित मेजर ध्यानचंद जी को भारत रत्न दिलाने को लेकर कई बार अलग-अलग स्तर पर मांग उठती रही है, लेकिन कांग्रेस हो या बीजेपी दोनों ही पार्टियों के प्रधानमंत्रियों ने ध्यानचंद को भारत रत्न देने के प्रति बेरूखी दिखाई है जोकि बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। मेजर ध्यानचंद के लिए भारत रत्न के संदर्भ में मैंने दो पंक्तियाँ लिखी हैं-

 

मनमोहन की तरह प्रधानमंत्री मोदी भी ना करें किनारा, 

मेजर ध्यानचंद को भारत रत्न दे क्यूँकि अब तो मोदी सरकार है दुबारा

 

एक समय गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए नरेंद्र मोदी ने भी ध्यानचंद को भारत रत्न देने की मांग की थी लेकिन आज नरेंद्र मोदी की दुबारा सरकार बन चुकी है और खुद प्रधानमंत्री मोदी भी ध्यानचंद को भूल चुके हैं। हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद को भारत रत्न दिए जाने में देरी होना दुर्भाग्य की बात है। यह कैसी विडंबना है कि मोदी सरकार साल 2016, 2017 और 2018 में किसी भी नागरिक को भारत रत्न देना तक भूल गयी। 

 

प्रधानमंत्री मोदी पिछले कुछ समय से 'मन की बात कार्यक्रम' में ध्यानचंद के जन्मदिन 29 अगस्त का जिक्र खेल दिवस के रूप में करने के साथ उनके हॉकी के कारनामों का जिक्र बराबर कर रहे हैं। 'मोदी है तो मुमकिन है' को ध्यान में रखते हुए मेरा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अनुरोध है कि मेजर ध्यानचंद को जल्द से जल्द भारत रत्न से सम्मानित किया जाना चाहिए। मरणोपरांत भारत रत्न मेजर ध्यानचंद को यह एक सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

 

-युद्धवीर सिंह लांबा

(लेखक अकिडो कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग, बहादुरगढ़ जिला झज्जर, हरियाणा में रजिस्ट्रार के पद पर कार्यरत हैं।)

 

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