By मनोज झा | Feb 10, 2018
देश में इन दिनों टेलीवीजन चैनलों पर पकौड़े पर महाबहस छिड़ी है। प्रधानमंत्री के पकौड़ा वाले बयान पर सियासत इस कदर गरम है कि हर जगह पकौड़े की ही चर्चा हो रही है। संसद से लेकर सड़क तक हर जगह पकौड़ा ही छाया है। एक दिन वो राजनीति की कड़ाही में तला जाएगा इसका अंदाजा पकौड़े को भी नहीं होगा।
राज्यसभा में अपने पहले भाषण में सरकार का बखान करते-करते अमित शाह पकौड़ा पर आकर अटक गए...बीजेपी अध्यक्ष ने कहा- भीख मांगने से तो अच्छा है कि कोई पकौड़ा बेचे। अमित शाह ने ये भी भविष्यवाणी कर डाली कि इस जनम में नहीं तो अगले जनम में पकौड़ा बेचने वाले का परिवार जरूर उद्योगपति बनेगा। अमित शाह ने सदन में मौजूद मोदी की ओर इशारा कर रहा कि आज चायवाले का बेटा देश का प्रधानमंत्री है। क्या पता ठेले पर पकौड़ा बेचने वालों की भी लॉटरी लग जाए?
लेकिन पकौड़ा बेचने वाले सावधान हो जाएं...अगर आपकी अगली पीढ़ी उद्योगपति नहीं बन पाती है तो अमित शाह से सवाल मत पूछिएगा...वर्ना खाते में 15 लाख आने की बात की तरह वो इसे भी सियासी जुमला करार दे देंगे। वैसे कांग्रेस जगह-जगह पकौड़ा सेंटर खोलकर मोदी सरकार को कठघरे में खड़ा कर रही है। यूपी में समाजवादी पार्टी जगह-जगह पकौड़ा स्टॉल लगाकर मोदी सरकार को घेरने में लगी है।
सत्ता में आने से पहले मोदी ने हर साल दो करोड़ युवाओं को रोजगार देने का वादा किया था..लेकिन मोदी सरकार के पहले तीन साल के कार्यकाल में करीब 10 लाख लोगों को ही रोजगार मिल सका। केंद्र सरकार के लेबर ब्यूरो के आंकड़ों पर नजर डालें तो 2014 में 4 लाख 21 हजार लोगों को नौकरियां मिलीं, साल 2015 में ये आंकड़ा घटकर 1 लाख 55 हजार हो गया, पिछले साल यानि 2016 में मोदी सरकार मैन्युफेक्चरिंग, कंस्ट्रक्शन समेत 8 प्रमुख सेक्टरों में 2 लाख 31 हजार लोगों को ही नौकरियां दे सकी। आपको बता दें कि जब यूपीए की दूसरी बार सरकार बनी तो पहले ही साल (2009) में 10 लाख से ज्यादा लोगों को नौकरियां मिली थीं।
अगर बीजेपी के चुनावी घोषणा पत्र पर नजर डालें तो रोजगार बढ़ाना उनके मुख्य एजेंडे में शामिल था। सत्ता में आने के बाद मोदी सरकार ने रोजगार बढ़ाने के लिए बड़े-बड़े वादे किए लेकिन जमीनी हकीकत सबके सामने है। अपनी सरकार के करीब 4 साल बीत जाने के बाद प्रधानमंत्री से जब रोजगार को लेकर सवाल पूछा जाता है तो वो ठेले पर पकौड़ा बेचने वालों का उदाहरण देते हैं और कहते हैं कि अगर कोई किसी दफ्तर के बाहर पकौड़ा बेचकर 200 रुपए कमाता है तो क्या वो रोजगार नहीं? प्रधानमंत्री जी अगर कोई किसी दफ्तर के बाहर ठेले पर पकौड़ा बेचता है तो इसमें आपकी सरकार का क्या योगदान है? सच्चाई तो यही है कि जब उसके पास जीविका चलाने का कोई साधन नहीं बचा तभी उसे सड़क पर आकर ठेला लगाना पड़ा। रोज पुलिसवालों की गाली सुनकर, उनके डंडे खाकर 200 रुपए कमाने को अगर मोदी सरकार रोजगार कहती है तो फिर इस देश के युवाओं का भगवान ही मालिक। हां एक बात और इस बार बीजेपी वाले ये समझने की भूल ना करें कि मणिशंकर अय्यर के चायवाले बयान की तरह पकौड़े वाले मुद्दे पर भी उन्हें फायदा होगा क्योंकि मोदी जी को कुर्सी पर 4 साल देखने के बाद अब जनता समझदार हो गई है।
मनोज झा
(लेखक टीवी चैनल में वरिष्ठ पत्रकार हैं।)