नीतीश कुमार और बादल परिवार का जिक्र कर मोदी ने जदयू और अकाली दल को बड़ा संदेश दिया है

By संतोष पाठक | Aug 02, 2023

एनडीए के विस्तार में जुटे भाजपा के अभियान के बाद जिन दो राजनीतिक दलों की एनडीए के पाले में वापसी को लेकर लगातार और बार-बार कयास लगाए जा रहे हैं, वह दोनों ही दल अभी तक इस बारे में कोई अंतिम फैसला शायद नहीं कर पा रहे हैं। स्वर्गीय प्रकाश सिंह बादल की पार्टी शिरोमणि अकाली दल जिसे उनके देहांत के बाद आजकल उनके बेटे सुखबीर सिंह बादल चला रहे हैं और दूसरा बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइटेड। यह दोनों ही राजनीतिक दल भाजपा के पुराने सहयोगी रहे हैं। भाजपा पंजाब और बिहार में इन दलों के साथ मिलकर लंबे समय तक सरकार चला चुकी है और यह दोनों ही राजनीतिक दल केंद्र की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार और नरेंद्र मोदी सरकार में भी शामिल रह चुके हैं लेकिन राजनीतिक परिस्थितियों की वजह से आज अकाली दल और जेडीयू, दोनों ही एनडीए से दूर हो चुके हैं।

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को एनडीए सांसदों की कलस्टरों की बैठक में एनडीए को त्याग की भावना से बना गठबंधन बताते हुए यह कहा कि विधायकों की कम संख्या होने के बावजूद भाजपा ने नीतीश कुमार को बिहार में मुख्यमंत्री बनाया। उन्होंने बादल परिवार को भी भाजपा के त्याग की याद दिलाते हुए कहा कि पंजाब में अकाली-भाजपा गठबंधन सरकार में भाजपा विधायकों की अच्छी खासी संख्या होने के बावजूद भाजपा ने उपमुख्यमंत्री का पद नहीं मांगा। याद दिला दें कि, पंजाब में अकाली-भाजपा गठबंधन की सरकार में प्रकाश सिंह बादल मुख्यमंत्री थे और उनके बेटे सुखबीर सिंह बादल उपमुख्यमंत्री। उस समय भाजपा के कई नेता दबी जुबान में यह कह रहे थे कि राजनीतिक दलों के बीच गठबंधन की स्थापित परंपरा के मुताबिक उपमुख्यमंत्री पद पर भाजपा का स्वाभाविक दावा बनता है और मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री दोनों ही पद एक ही पार्टी या यूं कहें कि एक ही परिवार के पास नहीं जाना चाहिए लेकिन अकाली दल के साथ गठबंधन को तवज्जो देते हुए भाजपा आलाकमान ने उस समय अपने ही स्थानीय नेताओं की बात को खारिज करते हुए सुखबीर सिंह बादल को उपमुख्यमंत्री बनाने के प्रकाश सिंह बादल के फैसले को स्वीकार कर लिया। लेकिन प्रधानमंत्री ने सोमवार को एनडीए की बैठक में भाजपा के त्याग का यह किस्सा सुना कर एक बड़ा राजनीतिक संदेश देने का प्रयास किया है।

यह माना जा रहा है कि प्रधानमंत्री ने नीतीश कुमार और अकाली दल को याद करके जो कुछ भी कहा, वह इन दोनों राजनीतिक दलों के लिए स्पष्ट तौर पर एक संदेश है कि भाजपा के दरवाजे इनके लिए अब भी खुले हुए हैं। मतलब साफ है कि अगर नीतीश कुमार अपने आप को राजनीतिक रूप से विरोधी दल के साथ गठबंधन में खासतौर से लालू यादव की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल के साथ गठबंधन की सरकार चलाने में पहले की तरह असहज महसूस कर रहे हो तो फिर से भाजपा के साथ आ सकते हैं। संकेत बिल्कुल साफ है कि नीतीश कुमार चाहें तो भाजपा के साथ आने के बावजूद भी वे राज्य के मुख्यमंत्री बने रह सकते हैं। पंजाब में अकेले दम पर लोकसभा चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही भाजपा ने अपने सबसे पुराने सहयोगी शिरोमणि अकाली दल के लिए भी अपने दरवाजे खुले रखे हैं। संकेत बिल्कुल स्पष्ट है कि भले ही राजनीतिक परिस्थितियां बदल गई हों, पंजाब में भाजपा अकाली दल से अलग होने के बाद लगातार मजबूत हुई हो लेकिन इसके बावजूद अगर अकाली दल फिर से एनडीए में शामिल होने का फैसला करता है तो भाजपा निश्चित तौर पर पहले के मुकाबले गठबंधन में अपने लिए ज्यादा स्पेस चाहेगी लेकिन साथ ही साथ बादल परिवार के सम्मान को भी बरकरार रखेगी।

एनडीए सांसदों की बैठक में नीतीश कुमार और अकाली दल को याद कर प्रधानमंत्री मोदी ने सिर्फ इन्हीं दोनों दलों को राजनीतिक संदेश देने का प्रयास नहीं किया है बल्कि इसके साथ-साथ उन्होंने एनडीए गठबंधन में शामिल वर्तमान राजनीतिक दलों और उनके सांसदों को भी एक स्पष्ट राजनीतिक संदेश देने का प्रयास किया है कि भाजपा के रुख, रवैये और स्टैंड को लेकर भाजपा के पुराने सहयोगी या भाजपा के विरोधी चाहे जो कुछ भी कहते रहें लेकिन आज की भाजपा भी अटल-आडवाणी के दौर की भाजपा है जो एनडीए के वफादार सहयोगियों का पूरा खयाल रखती है, सम्मान देती है और परिस्थितियों के अनुसार उन्हें उचित पद और तवज्जो भी देती है। भले ही इसके लिए भाजपा को अपने ही स्थानीय नेताओं की बात को खारिज करना पड़े, भले ही इसके लिए भाजपा को राजनीतिक रूप से बलिदान देना पड़े। प्रधानमंत्री का राजनीतिक संदेश अपने आप में पूरी तरह से स्पष्ट और बड़ा संदेश है। इसका असर तुरंत भारतीय राजनीति में भले ही ना पड़े लेकिन माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में इसका असर निश्चित तौर पर भारत में गठबंधन राजनीति पर पड़ेगा और इससे एनडीए के विस्तार में भी तेजी आना निश्चित है। प्रधानमंत्री के इस कथन को वर्तमान राजनीतिक हालात में उनके सिक्सर के तौर पर भी देखा जा रहा है जो विपक्षी दलों की पकड़ से बहुत दूर चला गया है।

-संतोष पाठक

लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तम्भकार हैं

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