सही कहा था Modi ने... एक एक बूंद पानी के लिए तरस रहा Pakistan, नहरें सूखीं, खेत बंजर हो रहे, शहरों में भी जल संकट

By नीरज कुमार दुबे | Jun 13, 2026

पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने जो रणनीतिक कदम उठाया था उसका असर अब पाकिस्तान के खेतों और उसकी अर्थव्यवस्था पर साफ दिखाई देने लगा है। भले पाकिस्तान पानी की कमी से त्राहि त्राहि कर रहा हो लेकिन भारत के केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल ने साफ कह दिया है कि आने वाले वर्षों में पाकिस्तान को सिंधु नदी प्रणाली से एक बूंद पानी भी नहीं मिलेगा, जबकि रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि आतंकवाद को संरक्षण देने वालों तक भारत सिंधु का पानी नहीं पहुंचने देगा। हम आपको बता दें कि सिंधु जल समझौते को स्थगित करने के फैसले ने पाकिस्तान की सबसे बड़ी कमजोरी पर चोट कर दी है। सिंध और बलूचिस्तान में नहरें सूख रही हैं, खेत बंजर होने लगे हैं और किसानों में भारी बेचैनी फैल गई है।

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देखा जाये तो भारत ने पहलगाम आतंकी हमले के बाद केवल सैन्य जवाब नहीं दिया, बल्कि कूटनीतिक मोर्चे पर भी ऐसी चोट की जिसने इस्लामाबाद की नींद उड़ा दी। ऑपरेशन सिंदूर के बाद नई दिल्ली ने सिंधु जल समझौते को स्थगित करके दुनिया को संदेश दिया कि आतंक फैलाने वालों को अब हर मोर्चे पर कीमत चुकानी होगी। हम आपको बता दें कि मोदी सरकार अब अपने इरादे को केवल राजनीतिक बयान तक सीमित नहीं रख रही, बल्कि उसे जमीन पर उतारने की तैयारी भी तेज कर चुकी है। केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल ने साफ शब्दों में कहा है कि आने वाले वर्षों में पाकिस्तान को सिंधु नदी प्रणाली से एक बूंद पानी भी नहीं मिलेगा। उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निर्देश पर सरकार सीमा पार पानी के प्रवाह को रोकने के लिए हर संभव कदम उठा रही है। पाटिल ने यह भी कहा कि गृह मंत्री अमित शाह खुद इस पूरी प्रक्रिया की निगरानी कर रहे हैं। वहीं रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने दो टूक कहा कि भारत अब आतंकवाद को संरक्षण देने वालों तक सिंधु का पानी नहीं पहुंचने देगा। उन्होंने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर और सिंधु जल संधि को रोकने का फैसला दुनिया को यह बताने के लिए काफी है कि भारत अब शांति की भाषा न समझने वालों को उसी की भाषा में जवाब देना जानता है।

दूसरी ओर, जल की कमी का असर पाकिस्तान के सबसे महत्वपूर्ण सिंचाई ढांचे सुक्कुर बैराज पर साफ दिखाई दे रहा है। सिंधु नदी पर बना यह विशाल ढांचा लाखों एकड़ खेती को जीवन देता है। लेकिन अब यहां से निकलने वाली नहरों में पानी तेजी से घट रहा है। उत्तर पश्चिम नहर में 64 प्रतिशत से अधिक कमी दर्ज की गई है। राइस नहर लगभग 38 प्रतिशत घाटे में चल रही है, जबकि दादू नहर की हालत सबसे भयावह है, जहां 82 प्रतिशत तक पानी कम हो चुका है।

स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि कई नहरों में तय हिस्से का केवल एक चौथाई पानी पहुंच रहा है। दादू नहर को जहां लगभग पांच हजार क्यूसेक पानी मिलना चाहिए था, वहां केवल आठ सौ साठ क्यूसेक पानी पहुंच रहा है। उत्तर पश्चिम नहर को छह हजार से अधिक क्यूसेक के बदले केवल 2100 क्यूसेक पानी मिल रहा है। किसान धान की नर्सरी तक तैयार नहीं कर पा रहे हैं। खेत सूख रहे हैं और गांवों में बेचैनी फैल रही है।

यहां एक और बात यह भी है कि पाकिस्तान के भीतर ही पानी की लूट और असमान वितरण ने भी आग में घी डाल दिया है। सिंध सिंचाई विभाग के आंकड़े बताते हैं कि पंजाब अपने तय हिस्से से 21 प्रतिशत अधिक पानी खींच रहा है। तौंसा बैराज भी तय सीमा से ज्यादा पानी ले रहा है। दूसरी तरफ निचले इलाकों में नहरें सूख रही हैं। इसका मतलब साफ है कि पाकिस्तान का आंतरिक ढांचा भी अब टूटने लगा है।

यही वजह है कि वहां राजनीतिक युद्ध छिड़ चुका है। जमात-ए-इस्लामी ने पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की सिंध सरकार को पानी संकट के लिए जिम्मेदार ठहराया है। वहीं पीपुल्स पार्टी संघीय तंत्र और जल प्रबंधन एजेंसियों पर हमला बोल रही है। पार्टी के वरिष्ठ नेता निसार अहमद खुह्रो ने खुलकर कहा है कि सिंध देश की 67 प्रतिशत कृषि उपज पैदा करता है, फिर भी उसे उसके हिस्से का पानी नहीं दिया जा रहा। उन्होंने खरीफ मौसम में पानी कटौती को सिंध का “आर्थिक कत्लेआम” बताया।

दरअसल पाकिस्तान की सबसे बड़ी कमजोरी अब उजागर हो रही है। उसकी पूरी कृषि व्यवस्था सिंधु नदी प्रणाली पर टिकी हुई है। वहां की अर्थव्यवस्था, खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण रोजगार का विशाल हिस्सा इसी पानी पर निर्भर है। भारत ने पहली बार इस कमजोरी को रणनीतिक हथियार में बदल दिया है। यह केवल पानी रोकने का मामला नहीं, बल्कि पाकिस्तान को यह समझाने की कोशिश है कि आतंकवाद की कीमत केवल सीमा पर नहीं, बल्कि देश की आंतरिक स्थिरता पर भी चुकानी पड़ेगी।

रणनीतिक दृष्टि से देखें तो भारत का यह कदम बेहद महत्वपूर्ण है। दशकों तक पाकिस्तान आतंक को राज्य नीति की तरह इस्तेमाल करता रहा, जबकि भारत केवल सैन्य जवाब तक सीमित था। लेकिन अब तस्वीर बदल चुकी है। नई दिल्ली ने जल, कूटनीति और आर्थिक दबाव को एक साथ जोड़कर बहुस्तरीय रणनीति तैयार की है। इसका असर केवल आज के संकट तक सीमित नहीं रहेगा। आने वाले महीनों में यदि पाकिस्तान के भीतर पानी को लेकर प्रांतीय संघर्ष और बढ़ते हैं, तो वहां राजनीतिक अस्थिरता, कृषि संकट और आर्थिक दबाव और गहरा सकता है।

बहरहाल, सबसे बड़ा संदेश यही है कि भारत अब केवल जवाब देने वाला देश नहीं रहा, बल्कि वह दुश्मन की सबसे कमजोर नस पहचानकर वहां चोट करने की नीति पर चल रहा है। पाकिस्तान ने वर्षों तक आतंक को हथियार बनाकर भारत को लहूलुहान करने की कोशिश की, लेकिन अब वही नीति उसकी अपनी धरती को सुखाने लगी है। सिंध और बलूचिस्तान के सूखे खेत बता रहे हैं कि भारत ने इस बार ऐसा प्रहार किया है जिसकी गूंज बहुत दूर तक जाएगी। वैसे भी नरेंद्र मोदी की कूटनीति की सबसे बड़ी खासियत भी यही मानी जाती है कि शुरुआत में अक्सर लगता है जैसे उनके फैसले का कोई बड़ा असर नहीं पड़ा, लेकिन समय बीतते ही पता चलता है कि चोट बेहद गहरी थी। आज पाकिस्तान के खेत, उसकी नहरें और उसकी बिखरती अर्थव्यवस्था उसी गहरी मार की कहानी कह रहे हैं।

-नीरज कुमार दुबे

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