By नीरज कुमार दुबे | Jan 09, 2026
अमेरिका ने रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 500 प्रतिशत टैरिफ लगाने की चेतावनी देकर वैश्विक व्यापार में नया तूफान खड़ा कर दिया है। इस कदम को सीधे तौर पर भारत, चीन और यूरोपीय संघ जैसे बड़े बाजारों के खिलाफ दबाव की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। खास बात यह है कि अमेरिका पहले से ही भारत पर ऊंचे टैरिफ लागू कर चुका है लेकिन इसके बावजूद भारत का निर्यात तेजी से बढ़ा है और अर्थव्यवस्था दुनिया में सबसे तेज गति से आगे बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था बनी हुई है।
देखा जाये तो अमेरिकी राजनीति में आक्रामक व्यापार नीति की वापसी हो चुकी है। डोनाल्ड ट्रंप के दौर की टैरिफ भाषा जोर पकड़ रही है। इसी कड़ी में अमेरिका ने भारत के नेतृत्व वाले अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन से खुद को अलग कर लिया है जिससे यह संकेत भी मिला है कि वह जलवायु और व्यापार दोनों मोर्चों पर बहुपक्षीय सहयोग से पीछे हट रहा है। अमेरिका की इस रणनीति से सिर्फ भारत या चीन ही नहीं बल्कि यूरोपीय संघ भी असहज है और वहां भी अमेरिकी धमकियों को लेकर बेचैनी बढ़ रही है।
वैसे भारत की स्थिति इस पूरे घटनाक्रम में अलग दिखाई देती है। हालिया आंकड़ों के अनुसार अमेरिकी टैरिफ के बावजूद भारत का निर्यात तीन वर्षों की सबसे तेज दर से बढ़ा है। घरेलू मांग में मजबूती, उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजनाओं, विनिर्माण को बढ़ावा देने और नियमों को सरल बनाने से भारतीय उद्योग को नया आत्मविश्वास मिला है। साथ ही मोदी सरकार ने उपभोक्ताओं को राहत देकर और सुधारों को तेज कर यह संदेश दिया है कि बाहरी दबावों के आगे झुकने की बजाय भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखेगा।
हम आपको यह भी बता दें कि अमेरिका की इस आक्रामक नीति से वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर भी असर पड़ने की आशंका है। यूरोपीय संघ के लिए यह चेतावनी है कि अमेरिका अपने हितों के लिए किसी को भी निशाना बना सकता है। वहीं भारत ने साफ कर दिया है कि वह दबाव की कूटनीति से नहीं बल्कि आर्थिक ताकत से जवाब देगा।
देखा जाये तो अमेरिका का 500 प्रतिशत टैरिफ का शोर दरअसल डर की राजनीति है। यह उस व्यवस्था की घबराहट को दिखाता है जो दुनिया के बदलते आर्थिक संतुलन को स्वीकार नहीं कर पा रही। भारत आज उस मोड़ पर खड़ा है जहां वह न तो किसी के सामने झुकने को तैयार है और न ही टकराव की बेकार लड़ाई में पड़ना चाहता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रणनीति साफ है यानि सीधी भिड़ंत नहीं बल्कि नीतिगत प्रहार किया जाये।
देखा जाये तो मोदी सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में जो सुधार किए हैं वे आज इस संकट के समय ढाल बनकर सामने आ रहे हैं। विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजनाएं हों या विदेशी निवेश के लिए नियमों का सरलीकरण हो, हर कदम का मकसद एक ही है भारत को आत्मनिर्भर बनाना। घरेलू उपभोक्ता बाजार की ताकत को सरकार ने रणनीतिक हथियार में बदला है। जब बाहरी बाजार दबाव बनाते हैं तब भीतर की मांग अर्थव्यवस्था को संभाल लेती है।
यदि अमेरिका सचमुच भारत पर 500 प्रतिशत टैरिफ लगाता है तो मोदी के पास कई विकल्प हैं। पहला है निर्यात बाजारों का और विविधीकरण। हम आपको बता दें कि भारत पहले ही एशिया अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है। दूसरा उपाय है घरेलू विनिर्माण को और आक्रामक समर्थन। तीसरा उपाय है व्यापार समझौतों को तेज करना ताकि अमेरिकी बाजार पर निर्भरता कम हो। चौथा उपाय है विश्व व्यापार संगठन जैसे मंचों पर कानूनी और कूटनीतिक लड़ाई।
वैसे अमेरिका की यह नीति खुद उसके लिए भी जोखिम भरी है। यूरोपीय संघ और चीन के साथ एक साथ टकराव वैश्विक मंदी को न्योता दे सकता है। भारत इस पूरे खेल में संतुलन की भूमिका निभा रहा है। न तो आंख दिखा रहा है और न ही आंख झुका रहा है। यही रणनीतिक परिपक्वता है। देखा जाये तो डोनाल्ड ट्रंप की शैली टैरिफ धमकी और दबाव पर आधारित रही है लेकिन मोदी की शैली नीतियों और सुधारों पर टिकी है। दोनों नेताओं के बीच यही मूल फर्क है। भारत ने दिखा दिया है कि टैरिफ से डर कर फैसले नहीं बदले जाते बल्कि अर्थव्यवस्था को इतना मजबूत बनाया जाता है कि टैरिफ बेअसर हो जाएं।
उधर, अमेरिका के सौर गठबंधन से हटने का फैसला भी यही बताता है कि वह सहयोग की नहीं बल्कि नियंत्रण की राजनीति चाहता है। इसके उलट भारत बहुपक्षीय सहयोग का पक्षधर रहा है। यही कारण है कि आज भारत को ग्लोबल साउथ की आवाज माना जा रहा है। देखा जाये तो आज भारत की अर्थव्यवस्था सिर्फ आंकड़ों की कहानी नहीं है बल्कि आत्मविश्वास की कहानी है। निर्यात का बढ़ना, घरेलू मांग का मजबूत होना और सुधारों की निरंतरता यह सब बताता है कि भारत सही दिशा में है। अमेरिका चाहे जितनी भी ऊंची दीवार खड़ी करे भारतीय अर्थव्यवस्था उसके ऊपर से रास्ता निकाल लेगी।
साथ ही यूरोपीय संघ और चीन के लिए भी यह समय आत्ममंथन का है। अमेरिकी दबाव के आगे झुकना समाधान नहीं है। भारत ने यह रास्ता दिखा दिया है कि आर्थिक मजबूती ही सबसे बड़ा जवाब है। इसलिए यह साफ है कि टैरिफ की राजनीति अल्पकालिक हथियार है जबकि सुधार और आत्मनिर्भरता दीर्घकालिक शक्ति हैं। मोदी की नीतियां इसी दीर्घकालिक सोच पर आधारित हैं। अगर अमेरिका 500 प्रतिशत टैरिफ का हथौड़ा उठाता है तो भारत के पास नीति सुधार, उपभोक्ता शक्ति और वैश्विक साझेदारी की पूरी ढाल मौजूद है। यही वजह है कि शोर चाहे जितना भी तेज हो, भारत की चाल शांत लेकिन घातक बनी हुई है।
बहरहाल, अमेरिका चाहे यह कह दे कि व्यापार समझौता इसलिए अटका क्योंकि मोदी ने फोन नहीं किया, लेकिन सच्चाई इससे कहीं अलग है। मोदी ऐसे नेता नहीं हैं जो दबाव में आकर या किसी के इशारे पर फैसले लें। भारत की नीति फोन कॉल से नहीं, राष्ट्रीय हित से तय होती है। अगर शर्तें देश के हित में नहीं हैं, तो मोदी पीछे हटने में संकोच नहीं करते। यही कारण है कि भारत आज आत्मविश्वास के साथ दुनिया से बात करता है। अमेरिका को यह समझना होगा कि नया भारत सम्मान चाहता है, आदेश नहीं। मोदी की विदेश नीति साफ है, बराबरी पर बात होगी, दबाव में नहीं।
-नीरज कुमार दुबे