By अभिनय आकाश | Oct 29, 2026
भारतीय सेना का बजट पिछले साल के मुकाबले 15% बढ़ाया गया। बढ़कर यह बजट लगभग 7.85 लाख करोड़ हो चुका है। एक मीटिंग में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की तरफ से 2.12 लाख करोड़ की खरीद को मंजूरी दी गई। दुनिया को पता है कि हिंदुस्तान के पास जो फाइटर जेट है फिलहाल उसमें उसके स्क्वाड्रन की कमी है।भारत को फाइटर जेट खरीदने हैं। 114 राफेल की डील हम दोबारा एक बार फिर से फ्रांस के साथ करने की कोशिश कर रहे हैं या फिर वो प्रक्रिया में है। ऐसे में राष्ट्रपति पुतिन का एक पुराना वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होता है। वो वीडियो इस साल के शुरुआत का जनवरी का है। जिसमें राष्ट्रपति पुतिन कहते हैं कि हमने भारत को ऑफर किया था एसयू57 साथ में बनाने की। भारत ने वो उसमें काम किया भी लगभग 10 साल लेकिन 2018 में भारत ने बैकऑफ वहां से कर लिया। चाहे वो एसयू57 हो या राफेल्स दोनों बिल्कुल अलग प्लेटफॉर्म्स हैं। एक एडवांस फाइटर एयरक्राफ्ट है जो रूस का यूनाइटेड एयरक्राफ्ट कॉरपोरेशन है। उसने मैन्युफैक्चर किया था। इसको नेटो में फेलन नाम से जाना जाता है। ये फिफ्थ जनरेशन का एक एयर सुपीरियरिटी एयरक्राफ्ट है। ये पार्शियली स्टेल्थ है जो सबसे बड़ा क्वेश्चन आता है इसमें। यह पूरी तरह स्टेल्थ नहीं है। पार्शियली स्टेल्थ है। लेकिन फिफ्थ जनरेशन एयरक्राफ्ट की सारी कैरेक्टरिस्टिक्स इसमें हैं। तो यह खाली एक पर्टिकुलर रोल के लिए नहीं है। ये आपके एयर टू एयर एनिमी एयरक्राफ्ट पे भी फाइट करेगा। ये जो आपके ग्राउंड पे टारगेट्स हैं उन्हें भी अटैक करेगा। मेरिटाइम मिशनंस के लिए या फिर आपके एयर डिफेंस इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग के लिए। ये सारी चीजों के लिए एसयू57 बहुत ही कैपेबल एयरक्राफ्ट है।
2007 की बात है जब भारत और रूस ने फिफ्थ देनरेशन एफजीएफ फिफ्थ जनरेशन फाइटर एयरक्राफ्ट का एक जॉइंट कोपरेशन किया था कि हम मिलकर एक फिफ्थ जेनरेशन एयरक्राफ्ट बनाएंगे और उसके बाद 2010 तक इसके जो प्रीमिलिनरी डिजाइन पार्ट था वो भी रेडी हो गया था। जहां पे हमारा एचएएल जो था और रशिया का जो रोस ग्रोन एक्सपोर्टर सुखोई था इन्होंने मिलकर उसका डिजाइन भी रेडी कर दिया था। उसके बाद प्रॉब्लम शुरू हुई 2010 के बाद जहां पर डिसएग्रीमेंट आई क्योंकि उस समय रूस पूरी तरह से हमें टेक्नोलॉजी देने को तैयार नहीं था। इंडिया डिफेंस के मामले में अभी भी आपको याद होगा 2014 से पहले वर्ल्ड का सबसे बड़ा इंपोर्टर था। इतनी बड़ी कंसीडरेशन हमें नहीं दी जाती थी कि हम एयरक्राफ्ट्स को भारत में बना पाएंगे।
टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की बात करी जाए तो हम अपनी टर्म्स कभी डिक्टेट ही नहीं कर पाते थे। हम दूसरी कंट्रीज पर डिपेंडेंट रहते थे। तो 2018 में जो था भारत ने इस जॉइंट डेवलपमेंट प्रोग्राम से विड्रॉ कर लिया और रूस ने बोला ठीक है आपने विड्रॉ कर लिया हम इसे कंटिन्यू करेंगे और रशिया ने एसयू57 को फिर इंडिपेंडेंटली डेवलप करा लेकिन 2025 में रूस ने अपनी मैन्युफैक्चरिंग पिच जो थी वो दोबारा दी रिन्यू करा उसको कि एरो इंडिया में रशिया ने बोला कि भारत जो है वो इस रेडी एयरक्राफ्ट को हमसे खरीद सकती है और यही नहीं उसके बाद जब 2026 जून में राष्ट्रपति पुतिन जब आए तो उन्होंने ने रूस की तरफ से बहुत सारी ऑप्शंस और भी दी कि आप इसकी जॉइंट डेवलपमेंट भारत में कर सकते हैं। टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की बात करें, सोर्स कोड्स की बात करें। बहुत जबरदस्त ऑफर एसयू57 को दी गई जिसे भारत अगर चाह अगर चाहता तो आज तक की जितनी फाइटर एयरक्राफ्ट हमारी डील हुई है, इतनी अच्छी ऑफर किसी हमारी देश ने नहीं दिया है। लेकिन सबसे बड़ा प्रॉब्लम क्या आया?
2018 में हमने पहले तो विड्रॉ क्यों किया? सबसे बड़ा हमारा कंसर्न आ रहा था कॉस्ट को लेके। क्योंकि जो फिफ्थ जनरेशन एयरक्राफ्ट है बहुत एक्सपेंसिव होता है। उसके अंदर जो प्रोटोटाइप्स बनते हैं विंड टनल टेस्टिंग है, इंज है, रेडार्स है, सॉफ्टवेयर हैं, उसकी वेपन इंटीग्रेशन, फ्लाइट टेस्टिंग उसके बाद जो उसमें अपग्रेड्स होंगे हर साल वो सारी चीजें बहुत ज्यादा कॉस्ट करती हैं। भारत के पास उस समय इतने फंड्स नहीं थे कि भारत इतना बड़ा इन्वेस्टमेंट एक पर्टिकुलर एयरक्राफ्ट में करें। इसके अलावा दशकों तक आपको किसी देश के साथ बाउंड होकर रहना पड़ेगा क्योंकि आपको नेक्स्ट लेवल के अपग्रेड चाहिए। नए एयरक्राफ्ट चाहिए। फिर उसके बाद प्रॉब्लम आई कि टेक्नोलॉजी कितनी मिलेगी? भारत को उस समय इतनी टेक्नोलॉजी नहीं मिल रही थी। बहुत लिमिटेड एक्सेस था।