पैसों वाला पेड़ (व्यंग्य)

By विजय कुमार | Mar 30, 2019

पेड़ तो सबने ही देखे हैं। कुछ पेड़ फलदार होते हैं, तो कुछ केवल छाया या ईंधन के काम आते हैं। पेड़ धरती के गहने हैं, चूंकि इन्हीं के बल पर हरियाली बनी रहती है। पेड़ अधिक हों, तो वर्षा भी खूब होती है। मौसम अच्छा रहता है। भरपूर ऑक्सीजन मिलने से लोग स्वस्थ रहते हैं। पर रात में पेड़ कार्बन डायऑक्साइड छोड़ते हैं, जो हमारे लिए घातक होती है। फिर वहां हिंसक और निशाचर पशु-पक्षियों का भी डेरा रहता है। कई बार चोर-उचक्के अपनी मेहनत का बंटवारा करते भी मिल जाते हैं। अतः रात में पेड़ों से दूर रहना ही ठीक है।

एक बार पार्टी में गरीबों के हित में कुछ योजनाएं लागू करने की बात उठी, तो अर्थशास्त्र के विद्वान मौनमोहन सिंह जी से रहा नहीं गया। उन्होंने साफ कह दिया कि पैसे पेड़ों पर नहीं लगते। फिर क्या था, गरीबों की हितकारी योजनाओं पर ताला लग गया; पर पार्टी नेताओं की अमीरी बढ़ाने के कार्यक्रम यथावत चलते रहे। तभी तो नेताओं की सम्पत्ति हर पांच साल में दस गुनी हो जाती है।

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पर अब नये और चिरयुवा अध्यक्ष जी का समय है। वे एक ऐसी धांसू योजना लाये हैं, जिससे गरीबी तो क्या, उनके पुरखे भी हमेशा को देष छोड़ देंगे। वैसे 50 साल पहले उनकी दादीजी ने ‘गरीबी हटाओ’ का नारा दिया था। पर वे पैसों वाला पेड़ नहीं खोज सकीं। इसलिए वह नारा फेल हो गया और उनकी सत्ता भी जाती रही। 

पर उस प्राचीन पार्टी के नूतन अध्यक्ष जी का कहना है कि अगर हमारी सरकार बनी, तो गरीबों को हर साल 72,000 रु. दिये जाएंगे। अध्यक्ष जी के पिताश्री ने एक बार कहा था कि दिल्ली से एक रु. चलता है; पर नीचे केवल 15 पैसे पहुंचते हैं। 85 पैसे कहां जाते हैं, ये तो वही जानते होंगे, क्योंकि उस पार्टी में ऐसी कमीशन का हिसाब करने वाले धुरंधर भरे पड़े हैं। अपनी सेवाएं देने को उनकी हथेली अभी से खुजाने लगी है। बेचारे गरीबों को भगवान ही बचाए।

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अर्थशास्त्री कहते हैं कि गरीब को हर दिन मछली देने की बजाय मछली पकड़ना सिखा देना चाहिए; पर फिर उस दलाली का क्या होगा, जिसके बल पर कई राजनीतिक खानदान और पार्टियां पल रही हैं। अतः उनके लिए ऐसी खैराती योजनाएं ही ठीक हैं। हमारे शर्मा जी भी खानदानी पार्टी के पुराने सदस्य हैं। कल उनके घर गया, तो पता लगा कि वे गरीबों की सूची में नाम लिखाने के लिए सरकारी दफ्तरों की खाक छान रहे हैं, जिससे उन्हें भी उस 72 हजारी योजना का लाभ मिल सके। धन्य हैं वे अध्यक्ष जी, जिन्हें पैसों वाला पेड़ मिल गया है और महाधन्य हैं वे लोग, जिन्होंने अभी से उसके नीचे पल्ला बिछा दिया है। आखिर, 85 प्रतिशत का हिसाब ऐसे ही तो पूरा होगा।

-विजय कुमार

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