Monsoon Forecast ने बढ़ाई चिंता, Food Production पर संकट, बढ़ेगी Inflation

By Ankit Jaiswal | Jun 03, 2026

देश में इस साल मानसून को लेकर चिंताएं बढ़ती नजर आ रही हैं। मौसम विभाग के अनुमान के अनुसार इस वर्ष सामान्य से करीब 10 प्रतिशत कम बारिश हो सकती है। इसके साथ ही कई इलाकों में लगातार गर्मी और लू की स्थिति बने रहने की संभावना जताई गई है। ऐसे में कृषि उत्पादन और खाद्य महंगाई को लेकर विशेषज्ञों ने चिंता व्यक्त की है।

विशेषज्ञों का कहना है कि अच्छी बारिश किसानों की आय बढ़ाने के साथ-साथ खाद्य वस्तुओं की कीमतों को नियंत्रित रखने में भी मदद करती है। वहीं कम बारिश की स्थिति में उत्पादन घटने का खतरा बढ़ जाता है, जिससे बाजार में खाद्यान्न की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है और महंगाई बढ़ सकती है।

पिरामल समूह के मुख्य अर्थशास्त्री देबोपम चौधरी के अनुसार केवल कम बारिश की वजह से खाद्य महंगाई में बहुत बड़ा उछाल आने की संभावना नहीं है। उनका मानना है कि इससे महंगाई में लगभग 0.25 प्रतिशत तक की वृद्धि हो सकती है। हालांकि यदि कम बारिश के साथ सूखे जैसी स्थिति भी बनती है, खासकर प्रमुख खरीफ उत्पादक क्षेत्रों में, तो खाद्य महंगाई में 0.50 प्रतिशत तक का अतिरिक्त दबाव देखने को मिल सकता है। उन्होंने वर्तमान परिस्थितियों में खाद्य महंगाई लगभग 5.5 प्रतिशत और खुदरा महंगाई करीब 5 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया है।

वहीं आईसीआईसीआई बैंक के अर्थशास्त्रियों का भी मानना है कि खाद्य और ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी के कारण खुदरा महंगाई 5 प्रतिशत से ऊपर रह सकती है। उनकी रिपोर्ट के अनुसार मांस, मछली, समुद्री खाद्य पदार्थ, फल, खाद्य तेल और तैयार खाद्य उत्पादों की कीमतों में पहले से ही बढ़ोतरी के संकेत दिखाई दे रहे हैं। इसके अलावा भीषण गर्मी के कारण सब्जियों और फलों जैसी जल्दी खराब होने वाली वस्तुओं की कीमतों पर भी दबाव बढ़ सकता है।

हालांकि मौसम विभाग इससे जुड़े जोखिम को लेकर पूरी तरह निराश नहीं है। क्षेत्रीय मौसम विज्ञान केंद्र, चेन्नई के प्रमुख डी. एस. पाई का कहना है कि समय रहते मानसून का पूर्वानुमान मिलने से किसान अपनी फसल योजना में बदलाव कर सकते हैं। बता दें कि कम पानी वाली फसलों जैसे मोटे अनाज, मक्का, दलहन और तिलहन की खेती को बढ़ावा देकर संभावित नुकसान को कम किया जा सकता है।

गौरतलब है कि पिछले कुछ वर्षों में किसानों ने बदलते मौसम के अनुसार खेती के तौर-तरीकों में बदलाव किया है। ऐसे में विशेषज्ञों को उम्मीद है कि यदि किसानों को सही जानकारी और समय पर मार्गदर्शन मिलता रहा तो उत्पादन पर पड़ने वाले असर को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। फिलहाल देश की नजर मानसून की वास्तविक प्रगति पर टिकी हुई है, क्योंकि आने वाले महीनों में यही तय करेगा कि खेती, महंगाई और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की दिशा क्या रहने वाली हैं।

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