By प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क | Feb 06, 2021
देश के आजादी आंदोलन में मोतीलाल नेहरू एक ऐसी शख्सियत थे जिन्होंने न केवल अपनी जिंदगी की शानोशौकत को पूरी तरह से ताक पर रख दिया बल्कि देश के लिए परिजनों सहित अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया। मोतीलाल नेहरू अपने दौर में देश के चोटी के वकीलों में थे। वह पश्चिमी रहन सहन वेशभूषा और विचारों से काफी प्रभावित थे। लेकिन बाद में वह जब महात्मा गांधी के संपर्क में आए तो उनके जीवन में बुनियादी परिर्वतन आ गया। पंडित मोतीलाल नेहरू अपने जमाने के शीर्ष वकीलों में शामिल थे। उस दौर में वह हजारों रुपए की फीस लेते थे। उनके मुवक्किलों में अधिकतर बड़े जमींदार और स्थानीय रजवाड़ों के वारिस होते थे। लेकिन वह गरीबों की मदद करने में पीछे नहीं रहते थे।
मोतीलाल के घर के चिराग जवाहरलाल नेहरू 1889 में पैदा हुए। बाद में उनकी दो पुत्रियां सरूप (बाद में विजयलक्ष्मी पंडित के नाम से विख्यात) और कृष्णा (बाद में कृष्णा हठीसिंह) पैदा हुईं। विजयलक्ष्मी पंडित ने अपनी आत्मकथा 'द स्कोप आफ हैप्पीनेस' में बचपन की यादों को ताजा करते हुए लिखा है कि उनके पिता पूरी तरह से पश्चिमी विचारों और रहन सहन के कायल थे। उस दौर में उन्होंने अपने सभी बच्चों को अंग्रेजी शिक्षा दिलवाई। विजयलक्ष्मी पंडित के अनुसार उस दौर में मोतीलाल नेहरू आनंद भवन में भव्य पार्टियां दिया करते थे जिनमें देश के नामी गिरामी लोग और अंग्रेज अधिकारी शामिल हुआ करते थे। लेकिन बाद में इन्हीं मोतीलाल के जीवन में महात्मा गांधी से मिलने के बाद बुनियादी परिवर्तन आ गया और यहां तक कि उनका बिछौना जमीन पर लगने लगा।
मोतीलाल 1910 में संयुक्त प्रांत (वर्तमान में उत्तर प्रदेश) विधानसभा के लिए निर्वाचित हुए। अमृतसर में 1919 के जलियांवाला बाग गोलीकांड के बाद उन्होंने महात्मा गांधी के आह्वान पर अपनी वकालत छोड़ दी। वह 1919 और 1920 में दो बार कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गये। उन्होंने देशबंधु चितरंजन दास के साथ 1923 में स्वराज पार्टी का गठन किया। इस पार्टी के जरिए वह सेन्ट्रल लेजिस्लेटिव असेम्बली पहुंचे और बाद में वह विपक्ष के नेता बने।
असेम्बली में मोतीलाल ने अपने जबरदस्त कानूनी ज्ञान के कारण सरकार के कई कानूनों की जमकर आलोचना की। मोतीलाल नेहरू ने आजादी के आंदोलन में भारतीय लोगों के पक्ष को सामने रखने के लिए इंडिपेंडेट अखबार भी खोला। देश की आजादी के लिए कई बार जेल जाने वाले मोतीलाल नेहरू का निधन छह फरवरी 1931 को लखनऊ में हुआ।