Mukul Roy को Supreme Court से बड़ी राहत, Calcutta HC के अयोग्यता वाले फैसले पर रोक

By अभिनय आकाश | Jan 16, 2026

सुप्रीम कोर्ट ने कलकत्ता हाई कोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें मुकुल रॉय को पश्चिम बंगाल विधानसभा के सदस्य के रूप में अयोग्य घोषित कर दिया गया था। रॉय 2021 में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के टिकट पर चुने जाने के बाद सत्तारूढ़ ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में वापस लौट आए थे। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने मई में विधानसभा का कार्यकाल समाप्त होने और आगामी राज्य चुनावों से कुछ महीने पहले यह अंतरिम आदेश पारित किया। अदालत ने विधानसभा अध्यक्ष बिमान बनर्जी और भाजपा नेताओं सुवेंदु अधिकारी और अंबिका रॉय को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है, जिन्होंने रॉय की अयोग्यता के लिए हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। पीठ ने निर्देश दिया कि चार सप्ताह के भीतर जवाबी हलफनामे दाखिल किए जाएं, जिसके बाद दो सप्ताह के भीतर प्रतिउत्तर दाखिल किए जाएं।

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सुप्रीम कोर्ट में अपील रॉय के बेटे सुभ्रांशु रॉय ने अपने पिता के अस्पताल में भर्ती होने का हवाला देते हुए दायर की थी। उन्होंने तर्क दिया कि अध्यक्ष ने उनके समक्ष प्रस्तुत सामग्री की सावधानीपूर्वक जांच की थी और जून 2022 में अयोग्यता याचिका को खारिज कर दिया था। 13 नवंबर को कलकत्ता उच्च न्यायालय ने स्पीकर के फैसले को पलट दिया। अधिकारी और अंबिका रॉय ने जून 2021 के एक वीडियो का हवाला दिया, जिसमें कथित तौर पर मुकुल रॉय और उनके बेटे को मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की उपस्थिति में टीएमसी मुख्यालय में पार्टी में शामिल होते हुए दिखाया गया था। सुभ्रांशु रॉय ने तर्क दिया कि स्पीकर ने याचिका इसलिए खारिज कर दी क्योंकि वीडियो में साक्ष्य अधिनियम की धारा 65बी के तहत प्रमाणीकरण का अभाव था। उनकी वकील, अधिवक्ता प्रीतिका द्विवेदी ने कहा कि उच्च न्यायालय ने माना है कि संविधान की दसवीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून) के तहत अयोग्यता का निर्णय करने के लिए ऐसे प्रमाणीकरण की आवश्यकता नहीं है।

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हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने अप्रमाणित इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों पर भरोसा करने पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में ऐसी सामग्री की प्रामाणिकता की जांच आवश्यक है। भाजपा नेताओं की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव अग्रवाल ने तर्क दिया कि रॉय भाजपा टिकट पर चुने जाने के बाद स्पष्ट रूप से दल बदल चुके थे और विधायक के रूप में बने नहीं रह सकते थे।

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