नेपाल बाढ़ में लापता डॉ. मिलिंद चितले के जीवित मिलने की उम्मीद क्षीण, मित्र ने याद किया हिमालय से नाता

By प्रभासाक्षी न्यूज़ डेस्क | Aug 31, 2026

मुंबई के चिकित्सक एवं पर्वतारोही मिलिंद चितले अपने जानने वालों के लिए महज एक मित्र नहीं बल्कि बहुत कुछ रहे हैं। नेपाल में 26 अगस्त को आई विनाशकारी बाढ़ के बाद हर गुजरते दिन के साथ उन्हें खोज पाने की उनके परिवार और शुभचिंतकों की उम्मीदें धुंधली पड़ती जा रही हैं। 1988 के पहले ऐतिहासिक भारतीय नागरिक कंचनजंघा अभियान में आधिकारिक चिकित्सक के तौर पर उनकी भूमिका की यादें ताजा होने के बीच, उनके लंबे समय से मित्र और अभियान सहयोगी चारु जोशी ने सोमवार को हिमालय के साथ चितले के दशकों पुराने रिश्ते को याद किया।

वह और उनकी पत्नी 61 सदस्यीय कैलाश मानसरोवर तीर्थयात्रा समूह का नेतृत्व कर रहे थे, जो 26 अगस्त को नेपाल-तिब्बत सीमा क्षेत्र में आई अचानक बाढ़ के बाद से लापता है। अधिकारियों के अनुसार, नेपाल में अचानक आई बाढ़ से मरने वालों की संख्या सोमवार को बढ़कर 903 हो गई है। बड़ी संख्या में शव बरामद किए जा रहे हैं और करीब 4,250 लोग अब भी लापता हैं।

जोशी ने कहा कि अब चितले के जीवित मिलने की उम्मीद ‘‘बेहद क्षीण’’ हो गई है। चितले का पहाड़ों से जुड़ाव कई दशक पुराना था, लेकिन 1988 का कंचनजंघा अभियान उनके पर्वतारोहण जीवन का एक महत्वपूर्ण अध्याय रहा। ‘कांगचेनजंघा 88’ के नाम से चर्चित यह अभियान असैन्य पर्वतारोहियों का एक महत्वपूर्ण प्रयास था, जिसमें मुख्य रूप से महाराष्ट्र के पर्वतारोही शामिल थे।

इसका उद्देश्य उन अभियानों में उपलब्ध सैन्य ढांचे के बिना दुनिया की तीसरी सबसे ऊंची चोटी पर चढ़ाई करना था। जोशी ने बताया कि चितले इस अभियान के आधिकारिक चिकित्सक थे। हालांकि दल चोटी तक नहीं पहुंच सका, लेकिन उसने कंचनजंघा के कुछ बेहद चुनौतीपूर्ण हिस्सों को पार करते हुए 8,000 मीटर की ऊंचाई का कठिन पड़ाव पार किया था।

इसे भारत में नागरिक पर्वतारोहण आंदोलन की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना गया। चितले के साथ 1981-82 से जुड़े जोशी ने ऊंचे हिमालय में साथ बिताए वर्षों को याद करते हुए कहा कि उस अभियान ने चार दशक से अधिक समय तक चलने वाली उनकी दोस्ती को मजबूत किया। जोशी ने कहा, ‘‘1988 में माउंट कंचनजंघा पर पहला नागरिक अभियान आयोजित किया गया था और वह हमारे आधिकारिक चिकित्सक थे।

हम बहुत करीबी दोस्त थे।’’ चितले ने वर्षों तक चिकित्सा सेवा के साथ पहाड़ों के प्रति अपने जुनून को जारी रखा और हिमालय उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गया। पिछले सप्ताह जब अचानक बाढ़ आई, तब चितले नेपाल में थे। जोशी, जो बाद में भारत लौट आए, स्थिति का जायजा लेने के लिए काठमांडू गए और भारतीय दूतावास के साथ समन्वय करने का प्रयास किया।

उन्होंने स्थानीय एजेंसी ‘रिचा ट्रेक्स’ से भी संपर्क कर चितले के बारे में जानकारी मांगी। जोशी ने कहा, ‘‘मैंने उससे साफ-साफ पूछा कि बचने की कितनी संभावना है। उसने कहा कि संभावना बहुत कम है, क्योंकि नेपाल-चीन सीमा पर आव्रजन केंद्र में हमेशा लंबी कतार लगी रहती है और बाढ़ उसी जगह आई थी।’’ उन्होंने बताया कि अनुमान है कि बाढ़ का पानी जब वहां से गुजरा तब आव्रजन केंद्र पर 600-700 लोग मौजूद थे, जिससे लोगों के जीवित बचने की संभावना बेहद कम हो गई।

जोशी के अनुसार, घटना वाले इलाके को नेपाल सेना, नेपाल पर्वतारोहण संघ और पुलिस ने घेराबंदी कर अपने नियंत्रण में ले लिया है। सेना ने त्रिशूली में एक नियंत्रण केंद्र भी स्थापित किया है। डॉ. चितले के नेतृत्व वाला समूह 23 अगस्त को मुंबई से काठमांडू के लिए रवाना हुआ था और 25 अगस्त की शाम को उनसे आखिरी बार संपर्क हुआ था।

इसके कुछ घंटे बाद 26 अगस्त की सुबह ऊंचाई वाले क्षेत्रों से आई बाढ़ के तेज बहाव ने महत्वपूर्ण आव्रजन ढांचे को तबाह कर दिया था। समूह को दो सितंबर को कैलाश परिक्रमा पूरी करने के बाद छह सितंबर को मुंबई लौटना था। डॉ. चितले ने अपने क्लीनिक के बाहर एक सूचना भी लगा रखी थी, जिसमें लिखा था कि क्लीनिक छह सितंबर तक बंद रहेगा।

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