Silver Power Shift: लंदन की तिजोरियां खाली, मुंबई में चांदी का राज! भारत ने कैसे पश्चिमी देशों के ‘पेपर सिल्वर’ गेम को पलट दिया

By प्रियंका | Jan 06, 2026

ग्लोबल कमोडिटी मार्केट में एक ऐसी खामोश हलचल हो रही है जिसने पश्चिमी देशों के वित्तीय गलियारों में चिंता बढ़ा दी है। सालों तक चाँदी की नब्ज़ लंदन और न्यूयॉर्क के हाथों में रही, लेकिन 2025 में भारत उस ‘व्हेल’ की तरह उभरा है, जो अब सिर्फ़ खेल का केवल हिस्सा भर नहीं रहा बल्कि उसके नियम भी तय कर रहा है। कभी गरीब का सोना कहे जाने वाली चांदी ने सिर्फ 12 महीनों में करीब 180 फीसदी की जबरदस्त छलांग लगाकर उद्योग, निवेशकों और नीति-निर्माताओं, तीनों का ध्यान खींचा है। दुनिया के दूसरे सबसे बड़े उत्पादक देश चीन द्वारा 1 जनवरी से इसके निर्यात पर लगे अनेक प्रतिबंधों के चलते माना जा रहा है कि आने वाले महीनों में भी चांदी की चमक बरकरार रहेगी। वैसे चांदी में यह बढ़त केवल हालिया नहीं है। बीते 45 सालों में इसके दामों में करीब 88 गुना तक की बढ़ोतरी हो चुकी है।

​'प्राइस-सेंसिटिव' से 'प्राइस-मेकर' तक का सफर

​अब तक माना जाता था कि भारतीय खरीदार केवल कीमतें गिरने पर ही चांदी खरीदते हैं। लेकिन इस बार कहानी अलग है। भारत अब 'बाइंगरिप' (Buying the Rip) की रणनीति अपना रहा है, यानी बढ़ती कीमतों पर भी आक्रामक खरीदारी। जहां अंतरराष्ट्रीय मार्केट में चांदी की 'पेपर' कीमत कम दिख रही है, वहीं मुंबई के हाजिर बाजार (Physical Market) में यह $75 प्रति औंस के करीब पहुंच गई है। यह इस बात का संकेत है कि भारत ने पश्चिमी देशों के 'कागजी भाव' को नकार दिया है।

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चांदी की डिमांड क्यों हाई है

​इसके पीछे 2 मुख्य कारण हैं जिन्हें हर भारतीय निवेशक को समझना चाहिए:

सोलर क्रांति और पीएलआई स्कीम: भारत सरकार की पीएलआई (Production Linked Incentive) योजना के तहत देश में सोलर पैनल की विशाल 'गीगाफैक्ट्रियां' लग रही हैं। सोलर सेल बनाने के लिए चांदी एक अनिवार्य धातु है। चांदी की कमी का मतलब है करोड़ों डॉलर के प्रोजेक्ट्स का रुक जाना। इसलिए, भारतीय कंपनियां भविष्य की सप्लाई अभी सुरक्षित कर रही हैं।

करेंसी वॉर और 'डी-डलराइजेशन': ब्रिक्स देशों के बीच बढ़ती नजदीकी और डॉलर पर निर्भरता कम करने की रणनीति के बीच, भारत चांदी को एक 'हार्ड एसेट' के रूप में देख रहा है। इसे 'यूनिट 939' जैसी गोपनीय रणनीतियों से भी जोड़कर देखा जा रहा है, जिसका मकसद देश के रणनीतिक धातु भंडार को बढ़ाना है।

न्यू एज टेक्नोलॉजी के विकास की रीढ़

डिजिटल अर्थव्यवस्था के मूल स्तंभ सेमीकंडक्टर, 5G नेटवर्क और डेटा सेंटर्स, इन सभी में चांदी अहम भूमिका निभाती है। एआई आधारित हाइपरस्मेल डेटा सेंटर्स को तेज, स्थिर और एनर्जी-एफिशिएंट कनेक्टिविटी चाहिए, जिस्के लिए चांदी जरूरी है। इसके अलावा सॉलिड स्टेट बैट्रियों में भी चांदी का उपयोग और बढ़ सकता है। एक ईवी में औसतन 25 ग्राम तक चांदी लगती है। यह चांदी बैट्रियों, पावर इलेक्ट्रॉनिकर, कंट्रोल यूनिट्स और चार्जिंग स्टेशनों में इस्तेमाल होती है। ईवी के चलन के साथ ही चांदी की मांग भी बढ़ती जा रही है। अमेरिका में ही 2030 तक 2.8 करोड़ ईवी चार्जिग पोट्र्स लगाने की योजना है, जिनमें चांदी की बड़ी खपत होगी।

​क्या चांदी 100 डॉलर के पार जाएगी?

​मार्केट एनालिस्ट्स का मानना है कि हम एक ऐतिहासिक 'शॉर्ट स्क्वीज' की ओर बढ़ रहे हैं। जब पश्चिमी एक्सचेंजों के पास फिजिकल डिलीवरी देने के लिए चांदी नहीं बचेगी, तब कीमतों में अचानक विस्फोट हो सकता है। भारत की यह आक्रामक खरीदारी चांदी को बहुत जल्द 'ट्रिपल डिजिट' (100 डॉलर से ऊपर) में धकेल सकती है।

चीन और अमेरिका का अलग गेम चल रहा

चांदी के दाम बढ़ने के पीछे भू-राजनीतिक वजहें भी हैं। ट्रम्प कैंप का मानना है कि भविष्य की जंग तेल नहीं, टेक्नोलॉजी और मेटल्स पर लड़ी जाएगी। इसी के चलते अमेरिका ने हाल ही में चांदी व तांबे को रेवर मेटल की श्रेणी में डाल दिया है। इसके मद्देनजर चीन ने भी चांदी के निर्यात पर सख्ती करनी शुरू कर दी है। इससे भी चांदी की कीमतें शूट होने लगी हैं। वहीं अमेरिका के धुर प्रतिद्ववंदी चीन कहां पीछे रहने वाला था। चीन के वाणिज्य मंत्रालय ने हाल में बताया कि इन दो सालों में सिर्फ 44 कंपनियां ही चांदी का निर्यात कर पाएंगी। इन्‍हें चीन अपने घरेलू उद्योगों के लिए बहुत जरूरी मानता है। इस तरह का कंट्रोल द‍िखाता है कि‍ चीन की ख्‍वाह‍िश इन्‍हें 'हथ‍ियार' की तरह इस्‍तेमाल करने की है। 

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