मुंबई ट्रेन ब्लास्ट केस- हाई कोर्ट का फैसला जांच एजेंसी के लिए बड़ा झटका, पीड़ितों को कब मिलेगा न्याय?

By संतोष कुमार पाठक | Jul 22, 2025

देश की आर्थिक राजधानी मुंबई को 11 जुलाई, 2006 को एक के बाद एक, कई बम धमाकों से दहला दिया गया था। आज भी मुंबई के लोग उस दिन को भूल नहीं पा रहे हैं। 11 जुलाई, 2006 को शाम के 6.24 बजे के लगभग जब लोग मुंबई लोकल से अपने घरों को लौट रहे थे तो सात जगहों पर हुए सीरियल बम धमाकों ने पूरे सिस्टम को हिला दिया था। जांच में पता लगा कि मुंबई को दहलाने के लिए उच्च क्षमता वाले आरडीएक्स और अमोनियम नाइट्रेट को प्रेशर कुकरों में भर कर ट्रेन में ले जाया गया था। इन बमों में बकायदा टाइमर लगाए गए थे। मुंबई की अलग-अलग रेल लाइनों में यह धमाके 6.35 तक हुए यानी 11 मिनट तक पूरी मुंबई दहलती रही। 

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अदालत ने कहा कि गवाहों के बयान और साक्ष्य आरोपियों को निचली अदालत से मिली सजा को कायम रखने का भरोसा पैदा नहीं करते हैं। यह विश्वास करना कठिन है कि आरोपियों ने यह अपराध किया है। यह टिप्पणी करते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट ने विशेष अदालत के सितंबर 2015 में दिए गए फैसले (जिसमें 12 लोगों को सीरियल बम धमाके का गुनाहगार माना गया था) को रद्द करते हुए सभी 12 लोगों को बरी कर दिया। गौरतलब है कि, मकोका की विशेष अदालत ने इन बम धमाकों के मामले में इन 12 आरोपियों में से 5 को फांसी और 7 को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इन आरोपियों में इंजीनियर और कॉल सेंटर के कर्मचारी तक शामिल थे। लेकिन बॉम्बे हाई कोर्ट के इस फैसले ने अभियोजन पक्ष (सरकारी वकील) के सिस्टम के साथ ही महाराष्ट्र के आतंकवाद निरोधक दस्ते (एटीएस) की कार्यप्रणाली पर ही बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।

पिछले 19 वर्षों के दौरान जांच की प्रक्रिया और अदालती सुनवाई के रिकॉर्ड को देखने पर तस्वीर पूरी तरह से साफ हो जाती है। वर्ष 2023 में तो सरकार की उदासीनता पर गहरी नाराजगी जताते हुए अदालत ने विशेष सरकारी वकील की नियुक्ति नहीं किए जाने को लेकर गृह विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव को तलब करने तक की चेतावनी दे दी थी। 

ऐसे में अब सबसे बड़ा सवाल यही खड़ा हो रहा है कि मुंबई की ट्रेनों में 7 बम धमाके, 187 मौतें, 824 घायल, 19 वर्षों की जांच और अदालती सुनवाई के बावजूद गुनाहगार की संख्या शून्य यानी जीरो। अगर महाराष्ट्र सरकार के मुताबिक, ये 12 लोग दोषी थे तो फिर इनके खिलाफ ठोस सबूत हाई कोर्ट के सामने पेश क्यों नहीं किए गए और अगर ये 12 लोग वाकई निर्दोष हैं (जैसा कि अदालत ने माना है) तो फिर इन बम धमाकों के असली साजिशकर्ता/ गुनाहगार कहां है ? इन सवालों का जवाब महाराष्ट्र की पुलिस, अभियोजन पक्ष और महाराष्ट्र सरकार को देना ही चाहिए। हालांकि अभी भी सरकार के पास बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का विकल्प मौजूद है। लेकिन इस कानूनी लड़ाई के साथ ही जांच एजेंसियों और खासतौर पर सरकार को आगे आकर पीड़ितों को न्याय दिलाने की ठोस पहल करनी ही चाहिए। इसके साथ ही हमें आतंकवादी घटनाओं और बम धमाकों जैसे अपराधों की जांच के लिए एक SoP भी बनाने की जरूरत है जिसमें जांच से लेकर अदालतों में सुनवाई तक का फुलप्रूफ सिस्टम होना चाहिए ताकि किसी भी स्तर पर कोताही की कोई भी गुंजाइश बचे ही ना। लेकिन क्या वाकई ऐसा हो पाएगा ?

- संतोष कुमार पाठक

लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं।

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