हिंदी को जन-जन तक पहुंचाया उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद्र ने

By शुभम यादव | Oct 08, 2020

हिन्दी साहित्य की गाथा को अमर करने में जिन महान साहित्यकारों, उपन्यासकारों और कहानीकारों का योगदान है उनमें मुंशी प्रेमचंद का नाम बड़े ही सम्मान से लिया जाता है। हिन्दी की गरिमा, हिन्दी साहित्य के इतिहास को भावी पहचान दिलाने का श्रेय मुंशी प्रेमचंद को जाता है। तमाम हिन्दी साहित्य के साहित्यकार शख्सियतों के बीच मुंशी प्रेमचंद की छवि बिल्कुल अद्वितीय है। बंगाल से ताल्लुक रखने वाले उपन्यासकार शरतचन्द्र चटोपध्याय ने मुंशी प्रेमचन्द्र को उपन्यासकार सम्राट की उपाधि से संबोधित किया।

वाराणसी के लमही गांव में 31 जुलाई 1880 को मुंशी प्रेमचंद का जन्म हुआ। इनका वास्तविक नाम धनपत राय श्रीवास्तव है। इनके पिता अजायब राय मामूली नौकर के तौर पर स्थानीय डाक खाने में कार्यरत थे। मुंशी प्रेमचंद की माता का देहांत तभी हो गया जब वह मात्र 8 वर्ष के थे। इनके पिता ने दूसरा विवाह रचा लिया जिससे इन्हें पिता का प्यार न मिल सका वहीं सौतेली मां के व्यवहार से मुंशी प्रेमचंद को काफी कष्ट भी रहा। मुंशी प्रेमचंद के दिन मुफ्लिसी में गुजरे न तो भरपूर खाना मिलता था और न पहनने के लिए कपड़े होते थे।

मुंशी प्रेमचंद की शिक्षा

तमाम विषम परिस्थितियों के बावजूद मुंशी प्रेमचंद ने मैट्रिक तक पढ़ाई की जिसके लिए वह बनारस तक पैदल जाया करते थे। मुंशी प्रेमचंद ने वकील बनने का सपना देखा था लेकिन यह सपना तब टूट गया जब उनके पिता का देहांत हो गया। पिता गुजर गए तो घर की जिम्मेदारी मुंशी प्रेमचंद पर ही आ गई। घर के सदस्यों, जिनमें उनकी सौतेली मां और उनके दो बच्चे तथा उनकी स्वयं की पत्नी की जिम्मेदारी प्रेमचन्द के कांधे पर आ गई। इसलिए वकील बनने का सपना टूट गया और कई मुश्किलों का सामना एक-एक दिन गुजारने के लिए करना पड़ा।

मुंशी प्रेमचंद का वैवाहिक जीवन

छोटी उम्र में ही पिता ने इनका विवाह प्रेमचंद से बड़ी उम्र की लड़की से करवा दिया जो न शक्ल से सुंदर थी और न वाणी से मीठी थी। अपने पिता के फैसले से प्रेमचंद काफी दुखी थे। बाद में इनके पिता को भी अपनी गलती का एहसास हुआ था। बताया जाता है की मुंशी प्रेमचंद का दूसरा विवाह भी हुआ था। इनकी पहली पत्नी पारिवारिक कारणों से मायके चली गई और कभी लौटकर नहीं आई बाद में मुशी प्रेमचंद ने दूसरा विवाह शिवरानी देवी से कर लिया। शिवरानी देवी बचपन में ही बालविधवा हो गईं थी। जिसकी वजह से उनका विवाह मुंशी प्रेमचंद से कर दिया गया।

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प्रेमचंद को किताबें बेचने की नौबत आई

प्रेमचंद के पिता के गुजरने के बाद आर्थिक रूप से यह इतने कमजोर हुए कि उन्हें अपना सबसे प्यारा कोट बेचना पड़ा साथ ही अपनी किताबें लेकर बुक सेलर के पास जा पहुंचे और किताबें बेचने का निश्चय किया। वहीं दुकान पर उनकी मुलाकात एक हेड मास्टर से हुई जो हमने अपने स्कूल में बतौर अध्यापक उन्हें रख लिया। मुंशी प्रेमचंद ने साल 1910 में अपनी पढ़ाई जारी रखते हुए अंग्रेजी, इतिहास, फारसी और दर्शन विषय लेकर इंटरमीडिएट की परीक्षा पास की। बाद में साल 1919 में इतिहास, अंग्रेजी और फारसी से बी.ए. की पढ़ाई की। इतना कुछ करने के बाद उन्हें शिक्षा विभाग में इस्पेक्टर की नौकरी मिल गई।

1921 में महात्मा गांधी के कहने पर अपनी नौकरी से इस्तीफा देते हुए असहयोग आंदोलन का हिस्सा बन गए। बाद में लेखक के तौर खुद को ढालना शुरु कर दिया। प्रेमचंद ने मर्यादा नामक पत्रिका में सम्पादन का कार्यभार संभाला और कुछ साल तक माधछरी नामक पत्रिका के संपादक रहे। 1933 से मायानगरी मुंबई में फिल्म के लिए कहानियां लिखी। 

1934 में फिल्मी पर्दे पर मुंशी प्रेमचंद की लिखी फिल्म मजदूर प्रदर्शित हुई। कुछ ही दिनों में अपना एग्रीमेंट अधूरा छोड़ मुंशी प्रेमचंद वापस बनारस आ गए।

मुंशी प्रेमचंद के प्रमुख उपन्यास 

वरदान, सेवा सदन, रंगभूमि, निर्मला, प्रेमाश्रम, कर्मभूमि, गबन, गोदान, प्रतिज्ञा, और आखिरी उपन्यास मंगलसूत्र जिसे उनके बेटे ने लिखकर पूरा किया।

मुंशी प्रेमचंद की प्रमुख कहानियां

पंच परमेश्वर, कफन, नमक का दरोगा, सौत, मंत्र, बंद दरवाजा, त्रिया-चरित्र, गुल्ली डंडा, कवच, कर्मों का फल, कप्तान साहब, ईदगाह, आल्हा, दो बैलों की कथा, आत्माराम, कातिल, जेल, झांकी, जुलूस, ठाकुर का कुआं पूस की रात, बड़े घर की बेटी आदि।

- शुभम यादव

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