Mahendra Kapoor की आवाज को आज भी मिस करते हैं संगीतप्रेमी, मोहम्मद रफी से प्रभावित होकर शुरू किया था गायन

By Prabhasakshi News Desk | Jan 09, 2025

एक बेहतरीन पार्श्वगायक के तौर पर महेंद्र कपूर का नाम बॉलीवुड में आज भी याद किया जाता है। अपने रूमानी गीतों से उन्होंने लगभग पांच दशक तक श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया। पार्श्वगायक महेंद्र कपूर का जन्म ठीक 91 साल पहले 9 जनवरी 1934 को अमृतसर में हुआ था। संगीत की ओर बचपन के दिनों से ही महेंद्र कपूर का रूझान था। महेंद्र कपूर ने संगीत की प्रारंभिक शिक्षा हुस्नलाल-भगतराम, उस्ताद नियाज अहमद खान, उस्ताद अब्दुल रहमान खान और पंडित तुलसीदास शर्मा से हासिल की थी।


मशहूर गायक मोहम्मद रफी से प्रभावित होकर महेन्द्र कपूर भी उन्हीं की तरह पार्श्वगायक बनना चाहते थे। अपने इसी सपने को पूरा करने के लिये महेंद्र कपूर मुंबई आ गये। 1958 में प्रदर्शित व्ही:शांताराम की फिल्म नवरंग में महेंद्र कपूर ने सी.रामचंद्र के सगीत निर्देशन में “आधा है चंद्रमा रात आधी” से बतौर गायक अपनी पहचान बना ली। इसके बाद महेंद्र कपूर ने कभी पूछे मुड़कर नहीं देखा और सफलता की नयी उंचाइयों को छुआ और एक से बढ़कर एक गीत गाकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।


लगभग पाँच दशकों के करियर में उन्होंने विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं में 25,000 गाने गाए। जिनमें 'चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों' (गुमराह), 'नीले गगन के ताले' (हमराज़) जैसे यादगार हिट शामिल हैं, लेकिन वे मनोज कुमार की फ़िल्म उपकार में 'मेरे देश की धरती' के साथ देशभक्ति गीतों के पर्याय बन गए।


महेंद्र कपूर कम उम्र में वे गायक मोहम्मद रफ़ी से प्रेरित थे। उन्होंने अपनी खुद की एक शैली बनाई और मेट्रो मर्फी अखिल भारतीय गायन प्रतियोगिता जीती, जिसके कारण 1958 में वी. शांताराम की नवरंग में पार्श्व गायक के रूप में उनकी शुरुआत हुई, जिसमें उन्होंने सी. रामचंद्र के संगीत निर्देशन में आधा है चंद्रमा रात आधी गाया। उन्होंने बीते दिनों के कई हिट गाने गाए, और सबसे उल्लेखनीय हैं बीआर चोपड़ा की फिल्मों (धूल का फूल, गुमराह, वक्त, हमराज़, धुंध आदि) और महान अभिनेता/निर्देशक मनोज कुमार (उपकार, पूरब और पश्चिम आदि) के लिए गाए गए गाने।


उनको भारत की जीवंत आवाज़ के रूप में जाना जाता है। पवारोट्टी की तरह, महेंद्र के पास भी एक बहुत बड़ी आवाज़ थी और एक खूबसूरत स्वर ताल थी। इसी वजह से उन्हें उनके सभी संगीतकार और प्रशंसक पसंद करते थे। अंग्रेजी में संगीत रिकॉर्ड करने वाले वह पहले भारतीय पार्श्व गायक थे। उन्होंने 'ओह सैली प्लीज हेल्प मी.. और आई एम फीलिंग ब्लू' गाया, जो किसी भारतीय गायक के लिए एक अद्भुत उपलब्धि थी। उन्हें प्रसिद्ध "बोनी एम" समूह ने पाकिस्तान के मुसरत के साथ हिंदी में अपने गाने गाने के लिए कहा और उन्होंने एवरहिट पॉप एल्बम एम-3 रिकॉर्ड किया।


उन्होंने भारत में लगभग हर भाषा में गायन किया है, और देशभक्ति, रोमांटिक, भजन, कव्वाली, नट जैसे लगभग हर तरह के गीतों को गाया और कवर किया है, और टीवी सीरियल "महाभारत" का शीर्षक गीत उनके पहले से ही ताज पहनाए गए मुकुट में एक और पंख है। उन्होंने गुजराती, पंजाबी और मराठी फिल्मों में सबसे ज्यादा गाने गाए। मराठी में वे दादा कोंडके की सभी फिल्मों में उनकी आवाज होने के कारण बहुत लोकप्रिय थे।


दादा कोंडके की बोलचाल की शैली से जुड़े होने के बावजूद मराठी फिल्मों के लिए उनका गायन केवल दादा कोंडके की फिल्मों तक ही सीमित नहीं था। उनके बेटे रोहन कपूर एक अभिनेता/गायक हैं। उन्होंने कुछ फिल्मों में अभिनय किया 1980 के दशक में यश चोपड़ा की फासले (1985) और लव 86 (1986), प्रकाश मेहरा की इमानदार जैसी फिल्मों में काम किया और बाद में अपने पिता के साथ स्टेज शो किए और एक अच्छे प्रशिक्षित गायक हैं। उन्होंने भारत और ब्रिटेन में कई एल्बम बनाए। महेंद्र कपूर को दुनिया भर में उनके लाखों प्रशंसक भारत की आवाज़ के रूप में पूजते हैं। 27 सितम्बर 2008 को हृदय गति रुकने से उनकी मृत्यु हो गई, उनके परिवार में पत्नी, तीन बेटियाँ और एक बेटा हैं।

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