By प्रभासाक्षी न्यूज़ डेस्क | Oct 04, 2026
(प्रदीप्त तापदार) कोलकाता, चार अक्टूबर बंगाल की राजनीति में किसी आंदोलन या राजनीतिक हिंसा में बच्चे को खो चुकी मां की पीड़ा कई बार निजी दुख से आगे बढ़कर राजनीतिक प्रतीक बन गई है। ऐसी माताएं अलग-अलग दौर में विरोध आंदोलनों, राजनीतिक संघर्ष और चुनावी राजनीति का चेहरा बनती रही हैं। नंदीग्राम में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) द्वारा चंद्रनाथ रथ की मां हसीरानी रथ को उपचुनाव में उम्मीदवार बनाए जाने से एक बार फिर ‘शहीद की मां’ का यह राजनीतिक प्रतीक चर्चा में है।
उनके 17 वर्षीय बेटे शेख इमदादुल इस्लाम की 14 मार्च, 2007 को नंदीग्राम में भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलन के दौरान पुलिस गोलीबारी में मौत हो गई थी। फिरोजा ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) के विधायक इलियास मोहम्मद स्कंद के इस्तीफे के कारण हुए उपचुनाव में जीत दर्ज की। बाद में उन्होंने 2011 के विधानसभा चुनाव में भी सीट बरकरार रखी।
राजनीतिक विश्लेषक बिस्वनाथ चक्रवर्ती ने कहा, ‘‘नंदीग्राम को खास तौर पर जो बात उल्लेखनीय बनाती है, वह है राजनीतिक उलटफेर। भूमि आंदोलन के दौरान बेटे की मौत के बाद फिरोजा बीबी वाम दलों के खिलाफ तृणमूल की लड़ाई का चेहरा बन गई थीं। आज हसीरानी रथ राजनीतिक हिंसा की एक अलग कहानी का प्रतिनिधित्व कर रही हैं।
पार्टियां बदल गई हैं, लेकिन भावनात्मक अपील वैसी ही बनी हुई है।’’ हालांकि, बंगाल की शहादत की राजनीति की जड़ें नंदीग्राम से कहीं अधिक गहरी हैं। वर्ष 1959 के खाद्य आंदोलन ने बंगाल में राजनीतिक शहादत की एक स्थायी संस्कृति को जन्म दिया। वाम दलों के नेतृत्व में चलाए गए इस आंदोलन में खाद्य संकट, जमाखोरी और चावल की बढ़ती कीमतों के खिलाफ प्रदर्शन किए गए थे।
31 अगस्त को हुए बड़े प्रदर्शन के दौरान पुलिस गोलीबारी में कई प्रदर्शनकारियों की मौत हो गई थी। वर्ष 1966 के खाद्य आंदोलन के दौरान इस घटना को एक मानवीय चेहरा मिला, जब छात्र नूरुल इस्लाम पुलिस गोलीबारी में मारे गए और उनकी मां अच्छिया बीबी ‘शहीद की मां’ के नाम से जानी जाने लगीं। वह दशकों तक वाम दलों के शहीद स्मरण कार्यक्रमों से जुड़ी रहीं।
राजनीतिक विश्लेषक शुभमय मोइत्रा ने कहा, ‘‘बंगाल में राजनीतिक मौतों को सामूहिक स्मृति में बदलने की लंबी परंपरा रही है। जब किसी मौत को किसी आंदोलन से जोड़ दिया जाता है, तो परिवार और खास तौर पर मां उस स्मृति के संरक्षक बन जाते हैं। यही वजह है कि राजनीतिक दल और मुद्दे बदलने के बावजूद ‘शहीद की मां’ का प्रतीक बार-बार सामने आता है।’’ ममता बनर्जी के नेतृत्व में निकाले गए विरोध मार्च के दौरान 21 जुलाई, 1993 को पुलिस गोलीबारी में युवा कांग्रेस के 13 कार्यकर्ता मारे गए थे।
तृणमूल के गठन के बाद बनर्जी ने 21 जुलाई को शहीद दिवस के रूप में पार्टी के कार्यक्रमों के कैलेंडर में प्रमुख स्थान दिया। रिजवानुर रहमान मामले ने इसका एक और रूप सामने रखा। 2007 में उनकी मौत के बाद उनकी मां किश्वर जहां ने न्याय की मांग की।
उस समय वाम मोर्चे की सरकार थी और ममता बनर्जी ने परिवार का समर्थन किया था। बाद में उनके बड़े बेटे रुकबानुर तृणमूल विधायक बने। नादिया के कालीगंज में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) की उम्मीदवार सबीना यास्मीन ने 2025 के उपचुनाव के बाद हुए जश्न के दौरान बम विस्फोट में अपनी बेटी तमन्ना खातून की मौत के बाद चुनावी राजनीति में कदम रखा।
वाम दलों ने 2026 के चुनाव प्रचार के दौरान उन्हें अपना चेहरा बनाया। हालांकि, इस बार ‘शहीद की मां’ का प्रतीक जीत में तब्दील नहीं हो सका और सबीना चुनाव हार गईं। पानीहाटी में 2024 में आरजी कर मेडिकल कॉलेज में प्रशिक्षु चिकित्सक के साथ दुष्कर्म और हत्या की घटना में जान गंवाने वाली युवती की मां रत्ना देबनाथ ने भाजपा के टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़ा और जीत हासिल की।
चक्रवर्ती ने कहा, ‘‘‘शहीद की मां’ की राजनीतिक ताकत इस तथ्य में निहित है कि दुख विचारधारा से अधिक प्रभावशाली होता है। शोकाकुल मां ऐसी कहानी लेकर सामने आती है जिसे मतदाता किसी राजनीतिक शब्दावली के बिना भी समझ सकते हैं। राजनीतिक दल उस त्रासदी को अन्याय, राज्य की हिंसा या राजनीतिक हिंसा की व्यापक कहानी से जोड़ देते हैं।’’ राज्य के एक विश्वविद्यालय के इतिहासकार ने नाम न उजागर करने की शर्त पर कहा, ‘‘बंगाल में हमने ‘शहीद की मां’ के प्रतीक का अंत नहीं, बल्कि एक राजनीतिक खेमे से दूसरे खेमे में उसका स्थानांतरण देखा है।
वाम दलों ने इसे वर्ग संघर्ष से जोड़ा; तृणमूल ने इसे प्रतिरोध और शहादत की अपनी राजनीति का हिस्सा बनाया; और अब भाजपा राजनीतिक हिंसा, सुरक्षा और न्याय के सवालों के इर्द-गिर्द इसी तरह की छवि का इस्तेमाल कर रही है।’’ नंदीग्राम के एक तृणमूल नेता ने कहा, ‘‘लोग सबसे पहले किसी शोकाकुल मां को नेता के रूप में नहीं देखते। वे उसे ऐसी मां के रूप में देखते हैं जिसने अपना बच्चा खो दिया है। यही भावनात्मक जुड़ाव है जिसकी वजह से ऐसी शख्सियत कभी-कभी किसी अनुभवी नेता की तुलना में राजनीतिक संदेश को अधिक प्रभावी ढंग से लोगों तक पहुंचा सकती है।’’ भाजपा के एक नेता ने कहा कि नंदीग्राम हमेशा से ‘‘ऐसी जगह रहा है, जहां राजनीतिक हिंसा को मानवीय चेहरा मिला।’’ माकपा नेता सुजन चक्रवर्ती ने कहा कि खतरा तब पैदा होता है जब शहीद को महज चुनावी प्रतीक तक सीमित कर दिया जाता है।
उन्होंने कहा, ‘‘शहीद के परिवार को केवल चुनाव के दौरान प्रासंगिक नहीं बनाया जाना चाहिए। असली कसौटी यह है कि क्या राजनीतिक व्यवस्था बाद में भी उस परिवार को याद रखती है।’’ नंदीग्राम इस बदलाव को असाधारण रूप से स्पष्ट करता है। फिरोजा बीबी उस समय विधानसभा पहुंची थीं, जब तृणमूल वाम दलों को चुनौती दे रही थी और वह भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलन में मारे गए एक युवा की मां थीं।
17 साल बाद रथ उसी चुनावी मैदान में मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के सहयोगी की मां के रूप में प्रवेश कर रही हैं।