Gyan Ganga: नारद का अहंकार, भगवान विष्णु का प्रण: बैकुंठ से निकले मुनि, फंसे माया के जाल में

By सुखी भारती | Nov 27, 2025

नारद मुनि अहँकार के घोड़े पर सवार थे। उनका यह घोड़ा दौड़ नहीं रहा था, अपितु उड़ रहा था। उड़ान भी ऐसी कि गरुड़ भी उसकी गति देख कर दाँतों तले अँगुली दबा ले।

इधर बैकुण्ठ धाम से श्रीहरि भी अपनी योजना को विस्तार…

नारद मुनि अहंकार के अश्व पर आरूढ़ थे। उनका यह अश्व केवल दौड़ ही नहीं रहा था, अपितु उड़ रहा था—और ऐसी उड़ान भर रहा था कि स्वयं गरुड़ भी उसकी गति देखकर दाँतों तले उँगली दबा लें।

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नारद मुनि के इस दर्प को देखकर भगवान विष्णु ने निश्चय कर लिया था कि वे मुनि के इस अहंकार रूपी रोग का शमन अवश्य करेंगे। नारद मुनि को इस बात का आभास तक न था कि जिन स्वप्निल इच्छाओं और सब्जबागों को वे अपने मन में सजाए बैठे हैं, उन्हें उखाड़ फेंकने की योजना भी बन चुकी है।

खैर, नारद मुनि का बैकुण्ठ आगमन-उद्देश्य पूर्ण हो चुका था, क्योंकि भगवान विष्णु ने उन्हें वैसा उपदेश नहीं दिया था, जैसा भगवान शंकर ने दिया था। इससे नारद मुनि के हृदय में बड़ा संतोष उत्पन्न हुआ—उन्हें लगा कि श्रीहरि ने भी मेरी प्रभुता और सामर्थ्य को जान लिया है।

अपनी ही कल्पनाओं में डूबे हुए, नारद मुनि भगवान विष्णु को प्रणाम कर बैकुण्ठ से विदा हो गए।

उधर श्रीहरि भी अपनी योजना को विस्तार देने में प्रवृत्त हो गए। जिस मार्ग से नारद मुनि को लौटना था, उसी मार्ग पर उन्होंने एक अनुपम माया-नगरी का निर्माण करवा दिया। वह नगर इतना अद्वितीय था कि उसकी आभा बैकुण्ठ से भी अधिक विलक्षण प्रतीत होती थी। वहाँ के नर-नारी ऐसे प्रतीत होते थे, मानो अनेक कामदेव और रतियाँ मानव देह धारण करके विचर रही हों।

उस नगर में शीलनिधि नामक राजा राज्य करता था। उसके पास असंख्य घोड़े, हाथी तथा विशाल सेना थी। उसका वैभव और ऐश्वर्य सौ इन्द्रों के तुल्य था। वह रूप, तेज, बल एवं नीति का धाम था। उसकी एक कन्या थी—विश्वमोहिनी—जिसके रूप को देखकर लक्ष्मीजी भी मोहित हो जाएँ—

‘सत सुरेस सम बिभव बिलासा।

रूप तेज बल नीति निवासा।।

बिस्वमोहिनी तासु कुमारी।

श्री बिमोह जिमि रूपु निहारी।।’

नगर में दूर-दूर से राजागण उपस्थित थे। वे सब विश्वमोहिनी के स्वयंवर में पधारे हुए थे, और सभी का एक ही उद्देश्य था—इस रूपवती का वरण करके उसे अपने साथ ले जाना।

नारद मुनि ने जब इस नगर का ऐश्वर्य देखा, तो वे आश्चर्यचकित रह गए। उन्हें विचार आया—“मैं तो अनेक बार बैकुण्ठ गया आया हूँ, परंतु पहले कभी इस विलक्षण नगर पर मेरी दृष्टि क्यों न पड़ी? चलो, देखें तो सही—यहाँ यह अद्भुत चहल-पहल किस हेतु है?”

यह सोचकर मुनि नगर में प्रवेश कर गए। नगरवासियों से उनका कुशल-क्षेम पूछकर वे राजमहल की ओर बढ़े। राजा शीलनिधि ने उनके चरण धोकर उन्हें उचित आसन पर विराजमान किया। नारद मुनि के मन में तभी यह अभिमान उठ रहा था—“देखो! मैंने कामदेव को परास्त क्या किया, समस्त संसार मेरे चरणों में आ गया।”

इसी बीच राजा शीलनिधि ने अपनी पुत्री विश्वमोहिनी को बुलवाया, और विनती की—“हे नाथ! कृपा करके मेरे हृदय की बात समझें और मेरी कन्या के समस्त गुण-दोषों का कथन करें।”

नारद मुनि ने जैसे ही विश्वमोहिनी का मुख देखा, वे अपलक निहारते ही रह गए। यद्यपि उन्होंने सभी लोकों का भ्रमण किया था, किन्तु ऐसा अनुपम रूप उन्होंने स्वर्ग में भी कभी नहीं देखा—

‘देखि रूप मुनि विरति विसारी।

बड़ी बार लागि रहे निहारी।।

लच्छन तासु बिलोकि भुलाने।

हृदयँ हरष नहिं प्रगट बखाने।।’

उसकी हस्तरेखाएँ और लक्षण देखकर तो मुनि स्वयं को ही भूल बैठे। भीतर से वे अत्यंत प्रसन्न थे, परन्तु बाहर से अपनी भावना किसी पर प्रकट न होने दी।

जिस कामविजय का डंका उन्होंने चारों दिशाओं में पीटा था, उसे नहीं पीटना चाहिए था। क्योंकि जिसके विषय में वे गर्व करते थे, वही कामदेव पुनः उनके मन के द्वार पर आ पहुँचा था। उनका मन विश्वमोहिनी की ओर से हट ही नहीं रहा था।

यदि केवल काम का आगमन होता, तो भी बात न्यून थी; परंतु यहाँ तो मुनि एक और पायदान नीचे उतरने को उद्यत थे। विश्वमोहिनी की हस्तरेखाओं में ऐसा कुछ था जिसने मुनि की आँखों में चमक भर दी थी।

आखिर क्या लिखा था उसके भाग्य में, जिससे मुनि भीतर ही भीतर प्रफुल्ल थे, परंतु किसी से कुछ कह नहीं रहे थे?

यह रहस्य अगले अंक में उद्घाटित होगा।

क्रमशः…

- सुखी भारती

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