Nayyi Navelli Movie Review: फैमिली ड्रामा में तो है दम, लेकिन अलौकिक उलझनों ने बिगाड़ा खेल, अनुराग ठाकुर ने चुराई महफिल

By रेनू तिवारी | Oct 21, 2026

झगड़ों से भरा एक परिवार, एक नई दुल्हन और एक देवर जिसे शक है कि कुछ तो गड़बड़ है। 'नयी नवेली' में एक मजेदार हॉरर-कॉमेडी बनने के सारे गुण हैं। बालाजी मोहन के निर्देशन में बनी यह फिल्म एक मनोरंजक मोड़ से शुरू होती है, जिसमें भरपूर फैमिली ड्रामा और अजीबोगरीब स्थितियां हैं जो कहानी को आगे बढ़ाती हैं। सवाल यह है कि क्या यह फिल्म अपना यह आकर्षण बनाए रख पाती है?

स्टार रेटिंग: 2 / 5 स्टार (2/5 Stars)
निर्देशक: बालाजी मोहन
मुख्य कलाकार: यामी गौतम धर, अनुराग ठाकुर, आदिनाथ एम. कोठारे, सुनीता राजवार, मीता वशिष्ठ
हाइलाइट: अनुराग ठाकुर की शानदार कॉमिक टाइमिंग और शुरुआती फैमिली ड्रामा फिल्म की मुख्य ताकत है।
कमजोरी: कमजोर पटकथा, अतार्किक पौराणिक पहलू और AI से बने औसत दर्जे के विजुअल इफेक्ट्स।

इन दृश्यों में अनुराग ठाकुर का काम वाकई शानदार है। उन्होंने बंटू के किरदार में एक स्वाभाविक कॉमिक टाइमिंग दिखाई है, जिससे साधारण बातचीत भी मजेदार बन जाती है। असल में, जब जोक्स उतने असरदार नहीं होते, तब भी अनुराग ठाकुर ही पूरी कहानी को संभाल लेते हैं। फिल्म उनके किरदार के साथ और भी बहुत कुछ कर सकती थी, लेकिन जितना भी उन्हें मिला, उसमें उन्होंने अपनी छाप छोड़ी है।

कहानी तब थोड़ी फीकी पड़ने लगती है जब इसमें 'काल शील' नाम के एक पत्थर का जिक्र आता है, जो रामायण और रावण की पौराणिक कथाओं से जुड़ा है। फिल्म धीरे-धीरे अपना ध्यान अलौकिक (supernatural) संघर्ष की ओर ले जाती है, और वह फैमिली ड्रामा, जिसने शुरुआत में फिल्म को मनोरंजक बनाया था, पीछे छूट जाता है। दुर्भाग्य से, कहानी का यह नया मोड़ उतना दिलचस्प नहीं है।

नयी नवेली: लेखन और निर्देशन
पौराणिक कथाओं को कॉमेडी के साथ मिलाना कोई बुरा विचार नहीं है, लेकिन यहां ये दोनों चीजें कभी ठीक से जुड़ नहीं पातीं। जैसे ही पारिवारिक दृश्यों में एक लय (rhythm) बनने लगती है, फिल्म किसी और दिशा में मुड़ जाती है। नतीजा यह होता है कि कहानी में कुछ अच्छे पल तो आते हैं, लेकिन वे अपना पूरा असर छोड़ने में नाकाम रहते हैं। पारिवारिक दृश्यों में एक जानी-पहचानी लय है, जबकि पौराणिक हिस्से ऐसे लगते हैं मानो वे किसी दूसरी फिल्म का हिस्सा हों। कहानी में गहराई जोड़ने के बजाय, ये उसके प्रवाह में रुकावट डालते हैं। नतीजा यह होता है कि फिल्म एक असंतुलित मनोरंजन बनकर रह जाती है, जो बार-बार अपने सबसे मजबूत पहलुओं से दूर होती जाती है।

इसके अलावा, कहानी के कई ऐसे हिस्से हैं जिन्हें मेकर्स आपस में जोड़ने की कोशिश तो करते हैं, लेकिन वे कभी ठीक से जुड़ नहीं पाते। 'राजा' सड़क के दूसरी तरफ क्यों है, किरदारों की उम्र क्या है, दशहरा से पहले दिवाली कैसे आ गई, और हनुमान वाला हिस्सा—ये सब मिलकर कहानी को कई जगहों पर अतार्किक (illogical) बना देते हैं।

साथ ही, पौराणिक फिल्मों के साथ एक आम समस्या देखने को मिल रही है। चाहे काजोल की 'माँ' वाला किरदार हो या यामी गौतम की 'नई नवेली', पुरानी कथाओं को दिखाने के लिए AI से बने दृश्यों का इस्तेमाल काफी आलस भरा और बिना किसी रचनात्मकता के लगता है। यह असल फिल्ममेकिंग के बजाय, बस AI को 'प्रॉम्प्ट' (निर्देश) देने जैसा काम लगता है। बालाजी मोहन इन दृश्यों पर बहुत ज्यादा निर्भर रहकर निराश करते हैं, और साथ ही वे पौराणिक तत्वों को अपनी कहानी से जोड़ने में भी नाकाम रहते हैं।

'नई नवेली': अभिनय
गौतम धर के पास काम करने के लिए बहुत कम गुंजाइश थी। कहानी के केंद्र में 'मोहिनी' है, लेकिन इस किरदार को ठीक से समझ पाना मुश्किल है। कई जगहों पर अभिनय एक जैसा ही लगता है; अलग-अलग स्थितियों में भी उनके हाव-भाव एक जैसे ही दिखते हैं। यह पूरी तरह से कलाकार की कमी नहीं है; पटकथा (writing) में ही उन्हें किरदार को विकसित करने का बहुत कम मौका दिया गया है। फिर भी, फिल्म को एक ज्यादा दमदार मुख्य किरदार की जरूरत थी, खासकर तब जब कहानी का बड़ा हिस्सा उसी पर टिका हो।

'राजा' का किरदार निभाने वाले आदिनाथ एम. कोठारे को भी पटकथा ने निराश किया है। वे भावुक दृश्यों में अपनी काबिलियत साबित करते हैं, लेकिन फिल्म उन्हें पूरी तरह निखरने का मौका नहीं देती। सुनीता राजवार और मीता वशिष्ठ पारिवारिक माहौल में जान डालती हैं, लेकिन बाकी कलाकारों को ऐसा कुछ खास करने को नहीं मिलता जिससे वे कोई गहरी छाप छोड़ सकें। घर में कई किरदार हैं, लेकिन फिल्म उनके आपसी रिश्तों का इस्तेमाल सिर्फ अगली गलतफहमी पैदा करने के लिए करती है, और उससे आगे कुछ खास नहीं दिखाती।

'नई नवेली': तकनीकी पक्ष
तकनीकी पक्ष से भी फिल्म को कोई खास मदद नहीं मिलती। कुछ विज़ुअल इफ़ेक्ट्स बनावटी लगते हैं, और यह तब और भी ज़्यादा खटकता है जब फ़िल्म दर्शकों से एक अलौकिक दुनिया को स्वीकार करने की उम्मीद करती है। कहानी में पूरी तरह से डूबने के बजाय, ये दृश्य आपको बार-बार याद दिलाते हैं कि आप बस एक तैयार किया गया तमाशा देख रहे हैं। गाने भी कोई ख़ास छाप नहीं छोड़ पाते। न तो वे फ़िल्म के माहौल में कुछ जोड़ते हैं और न ही कोई ऐसा यादगार संगीतमय पल देते हैं जिसे याद रखा जा सके।

लगभग 2 घंटे 18 मिनट की इस फ़िल्म को थोड़ा और छोटा किया जा सकता था। समस्या सिर्फ़ इसकी लंबाई की नहीं है, बल्कि उन हिस्सों पर बहुत ज़्यादा समय बर्बाद किया गया है, जिनसे कहानी को आगे बढ़ाने में कोई मदद नहीं मिलती। इस फ़ैमिली कॉमेडी में एक कसी हुई फ़िल्म बनने की पूरी क्षमता थी, लेकिन इसकी पटकथा (स्क्रीनप्ले) ही बार-बार इसमें रुकावट बन जाती है।


अंतिम फैसला (Verdict)
'नयी नवेली' में एक बेहतरीन हॉरर-कॉमेडी बनने की पूरी क्षमता थी, अगर यह बहुत सारी चीज़ें एक साथ आजमाने के बजाय अपनी मूल कहानी और फैमिली ड्रामा पर टिकी रहती। पहले हाफ में मिलने वाली हंसी और अनुराग ठाकुर के शानदार प्रदर्शन के लिए इस फिल्म को दिए जाते हैं 5 में से 2 स्टार। देखें या न देखें? अगर आप अनुराग ठाकुर की कॉमिक टाइमिंग और हल्के-फुल्के फैमिली ड्रामा के शौकीन हैं तो इसे एक बार देख सकते हैं, लेकिन भारी-भरकम लॉजिक या बेहतरीन हॉरर की उम्मीद न रखें।

प्रमुख खबरें

31 अक्तूबर को गुरु का सिंह राशि में गोचर, वृषभ राशि वालों के खुलेंगे तरक्की के रास्ते

न्यूजीलैंड में Shreyas Iyer की कप्तानी की कड़ी परीक्षा, जीत से आगाज का लक्ष्य

Iran US Dispute: परमाणु मुद्दा महज बहाना, विदेश मंत्री Abbas Araghchi का बड़ा बयान

Balochistan के Kech और Mastung से 8 लोग गायब, Pakistan सुरक्षा बलों पर आरोप