By प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क | Jun 12, 2026
राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) ने एम्पायर ट्रांसपोर्ट सर्विसेज लिमिटेड (ईटीएसएल) की नोएडा मेट्रो रेल कॉरपोरेशन (एनएमआरसी) के खिलाफ दायर दिवाला याचिका को खारिज कर दिया। न्यायाधिकरण ने पाया कि सेवा गुणवत्ता, अनुबंधीय दायित्वों और भुगतान कटौती को लेकर दोनों पक्षों के बीच पहले से विवाद जारी है। एनसीएलटी की इलाहाबाद पीठ ने दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) की धारा-9 के तहत एनएमआरसी के खिलाफ कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (सीआईआरपी) शुरू करने की ईटीएसएल की याचिका को अस्वीकार कर दिया।
समझौते में यह भी प्रावधान था कि भुगतान में देरी होने पर एनएमआरसी को प्रतिदिन नौ प्रतिशत की चक्रवृद्धि ब्याज दर से भुगतान करना होगा। ईटीएसएल ने आरोप लगाया कि उसने 25 अप्रैल 2019 से 16 मार्च 2020 के बीच ‘बिल’ दिए लेकिन कोई भुगतान नहीं मिला। इसके बाद उसने आईबीसी की धारा-8 के तहत नोटिस जारी किया और चूक (डिफॉल्ट) का दावा करते हुए परिचालन ऋणदाता के रूप में याचिका दायर की। एनएमआरसी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सुनील फर्नांडीस और अधिवक्ता अभिषेक प्रसाद व कौशलेंद्र नाथ सिंह ने दलील दी कि आईबीसी के तहत कोई भुगतान चूक नहीं हुई है। उन्होंने कहा कि ईटीएसएल ने अनुबंध के अनुरूप सेवाएं देने में बार-बार विफलता दिखाई और कई उल्लंघन किए, जिनके संबंध में कई कारण बताओ नोटिस जारी किए गए। ये
नोटिस इलाहाबाद उच्च न्यायालय में ईटीएसएल द्वारा दायर रिट याचिका में भी प्रस्तुत किए गए थे, जिसे 14 जुलाई 2021 को खारिज कर दिया गया था और इसके बाद विवाद में मध्यस्थता कार्यवाही शुरू की गई। इस पर सहमति जताते हुए एनसीएलटी की दो सदस्यीय पीठ ने कहा कि विवाद केवल भुगतान न होने का नहीं, बल्कि सेवा की गुणवत्ता एवं अनुबंध के तहत की गई कटौतियों को लेकर गंभीर मतभेदों का है।
न्यायाधिकरण ने कहा कि एनएमआरसी ने सेवा में कई कमियों को लेकर कई कारण बताओ नोटिस जारी किए थे, जिनमें जीपीएस और यात्री सूचना प्रणाली की खराबी, टूटी हुई विंडशील्ड, विकलांगों के लिए रैंप की खराब स्थिति, स्टॉप बटन का काम न करना, अपर्याप्त बस तैनाती, एयर कंडीशनिंग की समस्याएं और ईपीएफ व ईएसआई जैसे वैधानिक अनुपालन में कमी शामिल हैं।
उच्चतम न्यायालय के ‘मोबिलॉक्स इनोवेशन्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम किरूसा सॉफ्टवेयर प्राइवेट लिमिटेड’ से जुड़े फैसले का हवाला देते हुए न्यायाधिकरण ने दोहराया कि यदि मांग नोटिस जारी होने से पहले वास्तविक विवाद मौजूद हो, तो दिवाला आवेदन स्वीकार नहीं किया जा सकता।
एनसीएलटी ने कहा कि सेवा मानकों, अनुबंधीय प्रदर्शन, दंडात्मक कटौती और खातों के मिलान से जुड़े मतभेद स्पष्ट रूप से आईबीसी के तहत “पूर्व-विद्यमान विवाद” की श्रेणी में आते हैं। आशीष वर्मा और प्रवीण गुप्ता की पीठ ने कहा, ‘‘अतः धारा 5(6) के तहत वास्तविक एवं पूर्व-विवाद के अस्तित्व को देखते हुए... धारा-9 के तहत दायर वर्तमान आवेदन स्वीकार करने योग्य नहीं है और इसे खारिज किया जाता है।