थोड़ा रोना ज़रूरी होता है (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Nov 16, 2022

पिछले दिनों जनसभाओं में तरह तरह के नेताओं की आंखों से भावना जल बह निकला जिससे स्वाभाविक है आम जनता उद्वेलित हुई होगी। यह आंसू आम आंखों से बहने वाला पानी नहीं था कि चर्चा न हो, खबर न बने, सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल न हो। विपक्ष या सख्त हृदय वाले लोग इन्हें चुनावी आंसू कह सकते हैं। आम आदमी के आंसू, धांसू नहीं हो सकते लेकिन जब ख़ास व्यक्तियों के आंसू बहें तो पीड़ा स्वत बहने लगती है कि हाय मुझ जैसे काबिल, मेहनती बंदे को टिकट नहीं दिया, भ्रष्टाचार के झूठे आरोप लगाए, शपथ पत्र देना पड़ा। क्या भ्रष्टाचार के राजनीतिक आरोप सच्चे भी हो सकते हैं, कितना दिलचस्प हो यदि सच्चे आरोप लगाए जाएं। 

इसे भी पढ़ें: इंसान से आगे नहीं रोबोट (व्यंग्य)

दरअसल जो सुख रुलाने में है वह रोने में नहीं है। खुद रोकर हम तो दूसरों को भी रुलाने की कुव्वत रखते हैं और इसी बीच दिल जीतने का ज़रूरी काम हो जाता है। व्यवस्था ऐसी होती जा रही है सभी का अपना अपना रोना है। अकेले न रोकर सबके सामने रोते हैं जिसमें थोडा नाटक भी होता है। ज़िंदगी ठीक से गुजारने के लिए रोना-रुलाना एक ज़रूरी चीज़ हो गई है। महंगाई, बेरोजगारी, स्वास्थ्य, सड़क के गड्ढे, प्रदूषण जैसी महत्त्वहीन चीज़ों बारे रोती जनता को क्या पता कि राजनीतिक आंसुओं की क्या कीमत होती है।

कबीर ने भी, शिशु जन्म के बाद, परिवार वालों को खुश करने के लिए रोने की बात कही है। शिशु रोता नहीं तो उसे रुलाया जाता है। माहौल के मुताबिक बातों और चीज़ों को सकारात्मक लेना बहुत ज़रूरी होता है तो फिर ज़िंदगी को सहज बनाने वाले आंसुओं को थोड़ा सा बहा देने में क्या हर्ज़ है। इनके साथ, लोकतंत्र हारने या जीतने जैसी कोई संजीदा बात बहने वाली नहीं है।

प्रमुख खबरें

Team India में अब चलेगी Gautam Gambhir की? Suryakumar Yadav की Captaincy पर लेंगे आखिरी फैसला!

TVK कैबिनेट में शामिल होने पर Thirumavalavan की सफाई, बोले- VCK कार्यकर्ताओं ने मुझे मजबूर किया

पाक आर्मी चीफ Asim Munir की तेहरान यात्रा सफल? USA को उम्मीद, Iran आज मान लेगा डील

Rajnath Singh का Shirdi से ऐलान: कोई ताकत नहीं रोक सकती, India बनेगा Top Arms Exporter