बच्चों के विकास के लिए सदैव चिंतित रहते थे प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू जी

By प्रदीप कुमार सिंह | Nov 14, 2019

14 नवंबर को महान भारतीय स्वतंत्रता सेनानी और हमारे भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की जयंती पूरे देश में बाल दिवस के रूप में मनायी जाती है क्योंकि बच्चों के लिए उनका असीम प्यार और स्नेह था। वह आधुनिक भारत के निर्माता थे, ना केवल स्वतंत्रता की लड़ाई में बल्कि सामाजिक परिवर्तन में भी उनका बड़ा योगदान था। उन्हें बच्चे प्यार से चाचा नेहरू कहकर पुकारते थे, क्योंकि वे बच्चों के बहुत प्यारे थे और बच्चों के साथ सदैव बहुत घुले-मिले रहते थे। कहा जाता है कि वह गुलाब और बच्चों के बहुत शौकीन थे। वह बच्चों के विकास के लिए बेहद चिंतित रहते थे क्योंकि उन्हें विश्वास था कि बच्चे देश के भविष्य हैं। इसलिए बच्चों का अच्छी तरह से पोषण और शिक्षित होना समाज को मजबूत बनाता है। बाल दिवस चाचा नेहरू को श्रद्धांजलि और बच्चों पर उनके विचारों और देश की प्रगति में उनके योगदान के लिए एक श्रद्धांजलि है।

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स्वतन्त्र भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री का पद सँभालने के लिए कांग्रेस द्वारा नेहरू निर्वाचित हुए। प्रधानमन्त्री के रूप में वे भारत के सपने को साकार करने के लिए चल पड़े। भारत का संविधान 1950 में अधिनियमित हुआ, जिसके बाद उन्होंने आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक सुधारों के लिए एक महत्त्वाकांक्षी योजना की शुरूआत की। मुख्यतः एक बहुवचनी, बहु-दलीय लोकतन्त्र को पोषित करते हुए, उन्होंने भारत के एक उपनिवेश से गणराज्य में परिवर्तन होने का पर्यवेक्षण किया। विदेश नीति में भारत को दक्षिण एशिया में एक क्षेत्रीय नायक के रूप में प्रदर्शित करते हुए, उन्होंने गुट-निरपेक्ष आन्दोलन में एक अग्रणी भूमिका निभाई।

जवाहरलाल नेहरू का जन्म 14 नवम्बर 1889 को ब्रिटिश भारत में इलाहाबाद में हुआ। उनके पिता, मोतीलाल नेहरू एक धनी बैरिस्टर जो कश्मीरी पण्डित समुदाय से थे। उनकी माता का नाम स्वरूपरानी था। स्वतन्त्रता संग्राम के दौरान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के दो बार अध्यक्ष चुने गए। जवाहरलाल तीन भाई-बहनों में से सबसे बड़े थे, जिनमें बाकी दो लड़कियाँ थीं। बड़ी बहन विजया लक्ष्मी, बाद में संयुक्त राष्ट्र महासभा की पहली महिला अध्यक्ष बनीं। सबसे छोटी बहन, कृष्णा हठीसिंग, एक उल्लेखनीय लेखिका बनीं और उन्होंने अपने परिवार-जनों से संबंधित कई पुस्तकें लिखीं।

जवाहरलाल नेहरू ने दुनिया के कुछ बेहतरीन स्कूलों और विश्वविद्यालयों में शिक्षा प्राप्त की थी। उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा हैरो से और कालेज की शिक्षा ट्रिनिटी कालेज, कैम्ब्रिज (लंदन) से पूरी की थी। इसके बाद उन्होंने अपनी लॉ की डिग्री कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से पूरी की। इंग्लैंड में उन्होंने सात साल व्यतीत किए जिसमें वहां के फैबियन समाजवाद और आयरिश राष्ट्रवाद के लिए एक तर्कसंगत दृष्टिकोण विकसित किया। जवाहरलाल नेहरू 1912 में भारत लौटे और वकालत शुरू की। 1916 में उनकी शादी कमला नेहरू से हुई। जवाहर लाल जी की एकमात्र पुत्री इन्दिरा गांधी थीं। 1917 में जवाहर लाल नेहरू होम रूल लीग में शामिल हो गए। राजनीति में उनकी असली दीक्षा दो साल बाद 1919 में हुई जब वे महात्मा गांधी के संपर्क में आए। उस समय महात्मा गांधी ने रालेट अधिनियम के खिलाफ एक अभियान शुरू किया था। नेहरू, महात्मा गांधी के सक्रिय लेकिन शांतिपूर्ण, सविनय अवज्ञा आंदोलन के प्रति खासे आकर्षित हुए।

नेहरू ने महात्मा गांधी के उपदेशों के अनुसार अपने परिवार को भी ढाल लिया। जवाहरलाल और मोतीलाल नेहरू ने पश्चिमी कपड़ों और महंगी संपत्ति का त्याग कर दिया। वे अब एक खादी कुर्ता और गाँधी टोपी पहनने लगे। जवाहर लाल नेहरू ने 1920-1922 में असहयोग आंदोलन में सक्रिय हिस्सा लिया और इस दौरान पहली बार गिरफ्तार किए गए। कुछ महीनों के बाद उन्हें रिहा कर दिया गया। जवाहरलाल नेहरू 1924 में इलाहाबाद नगर निगम के अध्यक्ष चुने गए और उन्होंने शहर के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के रूप में दो वर्ष तक सेवा की। 1926 में उन्होंने ब्रिटिश अधिकारियों से सहयोग की कमी का हवाला देकर इस्तीफा दे दिया।

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नेहरू कांग्रेस के अध्यक्ष पद के लिए 1936 और 1937 में चुने गए थे। उन्हें 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान गिरफ्तार भी किया गया और 1945 में छोड़ दिया गया। 1947 में भारत और पाकिस्तान की आजादी के समय उन्होंने अंग्रेजी सरकार के साथ हुई वार्ताओं में महत्त्वपूर्ण भागीदारी की। 15 अगस्त 1947 को वह स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमन्त्री बने। अंग्रेजों ने 550 से अधिक देशी रियासतों को एक साथ स्वतंत्र किया था और उस वक्त सबसे बड़ी चुनौती थी उन्हें एक झंडे के नीचे लाना। उन्होंने भारत के पुनर्गठन के रास्ते में उभरी हर चुनौती का सरदार पटेल जैसे महान नेताओं के साथ मिलकर समझदारीपूर्वक सामना किया। जवाहरलाल नेहरू ने आधुनिक भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। उन्होंने योजना आयोग का गठन किया, विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विकास को प्रोत्साहित किया और तीन लगातार पंचवर्षीय योजनाओं का शुभारंभ किया। उनकी नीतियों के कारण देश में कृषि और उद्योग का एक नया युग शुरू हुआ। नेहरू ने भारत की विदेश नीति के विकास में एक प्रमुख भूमिका निभायी।

नेहरू जी ने व्यवस्थित रूप से अनेक पुस्तकों की रचना की है। राजनीतिक जीवन के व्यस्ततम संघर्षपूर्ण दिनों में लेखन हेतु समय के नितांत अभाव का हल उन्होंने यह निकाला कि जेल के लंबे नीरस दिनों को सर्जनात्मक बना लिया जाये। इसलिए उनकी अधिकांश पुस्तकें जेल में ही लिखी गयी हैं। उनके लेखन में एक साहित्यकार के भावप्रवण तथा एक इतिहासकार के खोजी हृदय का मिला-जुला रूप सामने आया है। नेहरू जी ने अपनी पुत्री इंदिरा गांधी को काल्पनिक पत्र लिखने के बहाने विश्व इतिहास का अध्याय-दर-अध्याय लिख डाला। ये पत्र वास्तव में कभी भेजे नहीं गये, परंतु इससे विश्व इतिहास की झलक जैसा सहज संप्रेष्य तथा सुसंबद्ध ग्रंथ सहज ही तैयार हो गया। भारत की खोज (डिस्कवरी ऑफ इंडिया) ने लोकप्रियता के अलग प्रतिमान रचे हैं, जिस पर आधारित भारत एक खोज नाम से एक उत्तम धारावाहिक का निर्माण भी हुआ है।

सर्वपल्ली राधाकृष्णन का मानना है कि उनकी आत्मकथा मेरी कहानी (ऐन ऑटो बायोग्राफी) जिसमें आत्मकरूणा या नैतिक श्रेष्ठता को जरा भी प्रमाणित करने की चेष्टा किए बिना उनके जीवन और संघर्ष की कहानी बयान की गयी है, हमारे युग की सबसे अधिक उल्लेखनीय पुस्तकों में से एक है। नेहरू जी की प्रकाशित पुस्तकें इस प्रकार हैं- 

(1) पिता के पत्र-पुत्री के नाम- 1929, 

(2) विश्व इतिहास की झलक (ग्लिंप्सेज ऑफ वर्ल्ड हस्ट्री)- (दो खंडों में) 1933,

(3) मेरी कहानी (ऐन आटो बायोग्राफी)- 1936, 

(4) भारत की खोज- हिन्दुस्तान की कहानी (दि डिस्कवरी ऑफ इंडिया)- 1945 

(5) राजनीति से दूर, 

(6) इतिहास के महापुरूष 

(7) राष्ट्रपिता 

(8) जवाहरलाल नेहरू वाङ्मय (11 खंडों में)।

नेहरू जी विश्व शान्ति के प्रबल समर्थक थे। नेहरू जी के अपने समय के वर्ल्ड लीडर्स से बहुत ही अच्छे संबंध थे। जवाहर लाल नेहरू ने टिटो और नासिर के साथ मिल कर एशिया और अफ्रीका में उपनिवेशवाद के खात्मे के लिए एक गुट निरपेक्ष आंदोलन की रचना की। वह कोरियाई युद्ध का अंत करने, स्वेज नहर विवाद सुलझाने और कांगो समझौते को मूर्तरूप देने जैसे अन्य अंतरराष्ट्रीय समस्याओं के समाधान में मध्यस्थ की भूमिका में रहे। पश्चिम बर्लिन, आस्ट्रिया और लाओस के जैसे कई अन्य विस्फोटक मुद्दों के समाधान में पर्दे के पीछे रह कर भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। उन्हें वर्ष 1955 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

पंडित जवाहरलाल नेहरू ने विश्व में शांति और अमन स्थापित करने के लिए पांच मूल मंत्र दिए थे, इन्हें ‘पंचशील के सिद्धांत’ भी कहा जाता है। माना जाता है अगर इन पांच सिद्धांतों पर अमल किया जाए तो दुनिया में हर तरफ चैन और अमन का ही वास होगा। यह सिद्धांत थे- 

- एक दूसरे की प्रादेशिक अखंडता और प्रभुसत्ता का सम्मान करना।

- एक दूसरे के विरुद्ध आक्रामक कार्यवाही न करना।

- एक दूसरे के आंतरिक विषयों में हस्तक्षेप न करना।

- समानता और परस्पर लाभ की नीति का पालन करना।

- शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की नीति में विश्वास रखना।

पं. नेहरू ने यह कह कर मानव जाति को जेताया था कि ‘‘या तो विश्व एक हो जायेगा या नष्ट हो जायेगा।’’ जवाहरलाल नेहरू ने युद्धों तथा आतंकवाद में उलझी मानव जाति को समाधान देते हुए कहा था कि “मेरा लंबे समय से विश्वास है कि शांति को पाने का एकमात्र रास्ता ‘‘विश्व सरकार’’ द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। 

-प्रदीप कुमार सिंह

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