कैसे बिखर रहा नेतन्याहू का ग्रेटर इजरायल का सपना, तय हुई फिलिस्तीन देश की स्थापना, भारत का क्या रहेगा रुख

By अभिनय आकाश | Sep 23, 2025

ग़ज़ा समर्पित है अस्वीकृति को...

25 मई 1990 की तारीख जिनेवा स्थित यूनाइटेड नेशन सिक्योरिटी काउंसिल यानी यूएनएससी की एक सभा बुलाई गई थी। फिलिस्तीन के सबसे बड़े नेता यासीर अराफात इसमें शामिल होने के लिए पहुंचचे थे। अराफात उस वक्त अमेरिका में प्रतिबंधित थे। यूएनएससी का दफ्तर न्यूयॉर्क में था। अराफात का यूएन में भाषण हो सके इसके लिए पूरा प्रोग्राम अमेरिका से शिफ्ट कर स्वीजरलैंड के जिनेवा में रखवाया गया था। 25 मई को जुमां का दिन था। फिलिस्तीनी काफिला जुमे की नमाज के बाद यूएन के दफ्तर पहुंचा। वहां अराफात का भाषण शुरू हुआ। वो पोडियम पर खड़े हुए और बोले आज मैं दुनिया के सामने इसराइली मंसूबों को बेनक़ाब करने आया हूं। इजरायल ने पिछली 4 सदी से फिलिस्तीन पर विनाशकारी युद्ध छेड़ा हुआ है। उसने ग़ाज़ा और वेस्ट बैंक पर अवैध कब्ज़ा कर रखा है। पूरी दुनिया को आज ये सुनिश्चित करना है कि इसराइल का ये अवैध कब्ज़ा छुडवाया जाए। साथ ही यूनाइटेड नेशन की एक नई टीम तैयार की जाए जिसे फिलिस्तीनी इलाकों में भेजा जाए औऱ ये वहां जाकर मुआएना करें कि इजरायली फिलिस्तीनियों के साथ क्या कर रहे हैं।  

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इतना बोलकर अराफात ने कहा कि अब मैं आपके सामने कुछ दस्तावेज लेकर आया हूं। जो मैं आपको दिखाना चाहता हूं। फिर अराफात ने 10 रुपए का इजरायली सिक्का निकाला जिसे 10 एगोरा कहते हैं। अराफात ने सिक्का दिखाते हुए दावा किया कि इसमें एक तरफ ग्रेटर इजरायल का नक्शा बना हुआ है। इस नक्शे में सऊदी अरब, लेबनान, सीरिया और इजिप्ट के कई हिस्सों को इजरायल का दिखाया गया है। इसे यहूदियों का एक तबका प्रॉमिश लैंड कहता है। उनका मानना है कि ये जमीन ईश्वर ने उनके लिए ही बनाई थी ताकी वे यहां आकर बस सके। 1948 में ये स्टेट अस्तित्व में आया। 1948 के बाद से लगातार इसकी सीमाएं बढ़ती ही जा रही है। इजरायल की बढ़ती सीमा के चलते ग्रेटर इजरायल जैसी थ्योरी को हवा मिली है। 

फिलिस्तीनियों को जबरदस्ती पानी में ढकेलने वाली दुनिया अब उन्हें तिनके का सहारा देने आई है। 21 सितंबर को ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और पुर्तगाल ने फिलिस्तीन को देश के तौर पर मान्यता दे दी। तीनों देशों ने साफ कहा कि हम फिलिस्तीन को देश की मान्यता देते हैं और वो भी 1967 की सीमाओं के आधार पर। यानी वो फिलिस्तीन जिसकी आधी से ज्यादा जमीन को इजरायल ने कब्जा कर लिया है। इन तीनों देशों ने साफ कह दिया है कि ये कब्जा अवैध है और असली फिलिस्तीन 1967 वाला है। यानी जो नक्शा अमेरिका और इजरायल को कभी मंजूर नहीं था। वही आज ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया ने पूरी दुनिया के सामने स्वीकार कर लिया। 

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22 सितंबर के दिन फ्रांस और सऊदी अरब की अगुवाई में एक समिट बुलाई गई जिसमें फ्रांस ने औपचारिक रूप से फिलिस्तीनी देश को मान्यता देने की घोषणा की है। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने कहा कि शांति का समय आ गया है। गाजा में युद्ध, नरसंहार और मौतों को समाप्त करने का समय आ गया है। बात इतनी बड़ी है कि इजरायल को ब्रिटेन से समझाइश मिली है कि कुछ रिएक्शन मत देना। सब खिलाफ खड़े हैं और कदम फूंक फूंक कर रखने की जरूरत है। इस कदम से फिलिस्तिनियों का मनोबल बढ़ गया है। वो खुश हैं। अरसे बाद दुनिया उनके उम्मीद के मुताबिक चल रही है। इन सब के बीच कुछ सवाल भी उठ रहे हैं कि क्या इन कदमों से जमीनी हकीकत भी बदल जाएगी। इजरायल क्या ऐसी कोई गुंजाइश छोड़ेगा। इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का कहना है कि ऐसा कुछ नहीं होने वाला। जॉर्डन नदी के पश्चिम में कोई फिलिस्तीन मुल्क कायम नहीं होने वाला है। 

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कनाडा और ब्रिटेन जी7 समूह का हिस्सा हैं। पहली बार इस समूह के सदस्य देशों ने फिलिस्तीन को मान्यता दी है और इस कतार में फ्रांस भी है। अमेरिका की नाराजगी के बावजूद वॉशिंगटन के सहयोगी देश अगर फलस्तीन मुद्दे का साथ दे रहे हैं, तो इसकी बड़ी वजह गाजा के मौजूदा हालात हैं। हमास-इजरायल संघर्ष शुरू होने के बाद से गाजा में 65 हजार से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं और इनमें ज्यादातर आम नागरिक हैं। लाखों लोग भुखमरी और विस्थापन झेल रहे हैं। इससे बड़ी त्रासदी यह है कि संघर्षविराम की कोई सूरत नजर नहीं आ रही और इस्राइल के नए ग्राउंड एक्शन से हालात और खराब हो गए हैं। हाल में कतर की राजधानी दोहा में इस्राइल के हवाई हमलों से भी बेचैनी बढ़ी और शांति की उम्मीदें धुंधली हो गई।

इजरायल के अस्तित्व में आने से पहले ही दो राष्ट्र का सिद्धांत जन्म ले चुका था एक यहूदी राज्य और एक अरब राज्य। इस विवाद का यही सबसे बेहतर हल भी दिखता है। पिछले कुछ बरसों में इजरायल की तरफ भारत का झुकाव ज्यादा दिखा है। संयुक्त राष्ट्र में कई बार उसने इजरायल-फिलिस्तीन मामले से दूरी बनाए रखी। लेकिन, पिछले हफ्ते संयुक्त राष्ट्र महासभा में टू स्टेट सॉल्यूशन पर मतदान हुआ तो भारत ने इसके समर्थन में वोट दिया। 

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