शिक्षा के नए ख़्वाब (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Sep 23, 2020

शैक्षिक बस्ते को बदलने की कोशिश चंद दिनों में सफल होने वाली है। बदलाव पहले कागजों पर ही लाया जाता है लेकिन समय चालू होने के कारण बदलते, संवरते, टिकते हुए काफी कुछ अदल बदल जाता है। हिंदी प्रेमियों के बच्चों को पैदा होते ही विदेशी भाषा नहीं सीखनी पड़ेगी बलिक कई साल तक पढ़ाई मातृभाषा में होगी। बस ज़रा संशय है, कहीं बाज़ार नाराज़ न हो जाए। कितना सकारात्मक है कि घर की भाषा में बच्चा पांचवीं पास कर लेगा। वैसे भी आजकल बचपन लौट आया है और घर पर ही है। हमारे अनेक अध्यापकों को हिंदी का इंजेक्शन लगवाना पड़ेगा ताकि जिनको अंग्रेजी में अवकाश प्रार्थना पत्र लिखना नहीं आता, अपनी भाषा लिख सकें।

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हम पुराने ज़माने में छटी क्लास में एबीसीडी करते थे लेकिन सामाजिक, राजनैतिक व आर्थिक सांचों में ढल जाने के कारण न अंग्रेजी सीख सके न हिंदी। तबादला नीति के स्वस्थ बीज विकसित करने का ख़्वाब भी है लेकिन फिर कर्मचारी नेता, राजनीतिज्ञ और तबादला व्यवसायी क्या करेंगे। हां स्कूलों में उच्च कोटि के मास्क और सेनीटाइज़र सप्लाई करने का व्यवसाय शुरू कर सकते हैं। सभी ख़्वाब नए उत्कृष्ट अंदाज़ में, वातानुकूलित, साफ़ सुथरे, कोरोना रहित कक्ष में बैठे समझदार, उच्च शिक्षित, योग्य व्यक्ति द्वारा देखे गए हैं। यह सुनिश्चित हो चुका है कि ख्वाब सच साबित करने के लिए बेहद अनुशासनात्मक, रचनात्मक व गुणवत्तापरक रास्ता चुना जाएगा। सुना है फिजिक्स, मैथ व कैमिस्ट्री पढ़ाने वाले अपने बच्चों के उज्ज्वल कमाऊ कैरियर निर्माण के लिए भविष्यवक्ताओं के पास जाना छोड़ देंगे। ख्वाबों की दुनिया बहुत आकर्षक होती है।

- संतोष उत्सुक

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