By उमेश चतुर्वेदी | Aug 27, 2026
महाराष्ट्र के ऑटो-रिक्शा और टैक्सी चालकों के लिए कामचलाऊ मराठी भाषा जरूरी किए जाने को लेकर विवाद उठना स्वाभाविक है। यह विवाद बांबे हाईकोर्ट भी पहुंच गया है। महाराष्ट्र सरकार ने इस नियम को लागू करते हुए तर्क दिया है कि इससे यात्रियों और टैक्सी-ऑटो चालकों के बीच भरोसा बढ़ेगा और यात्रियों में सुरक्षा का भाव रहेगा। मोटे तौर पर सरकार की यह दलील बेहतर लगती है, लेकिन जब राज्य की टैक्सियों और ऑटो की संख्या और उनके चालकों पर ध्यान देते हैं तो यह सवाल सिर्फ भाषा का नहीं रह जाता, बल्कि उपराष्ट्रीयता के उभार और उसके बहाने राष्ट्रीयता के विचार को चुनौती का भी हो जाता है। इस सोच का सिरा आगे बढ़ते हुए हिंदी विरोध और प्रकारांतर से पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड के प्रवासियों की मुखालफत तक जा पहुंचता है।
महाराष्ट्र के ताजा आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक, राज्य में 12 लाख 96 हजार से ज्यादा ऑटो हैं, जबकि करीब पांच लाख टैक्सियां हैं। यहां के परिवहन विभाग के मुताबिक, अकेले ग्रेटर मुंबई इलाके में करीब पांच लाख टैक्सियां और ऑटो रिक्शा चल रहे हैं। इनमें करीब 75 फीसद ऑटो-टैक्सी चालक गैर मराठी और हिंदीभाषी इलाकों के ही हैं। राज्य के दूसरे इलाकों में करीब आधे ऑटो-टैक्सी चालक हिंदीभाषी हैं। महाराष्ट्र ही क्यों, किसी भी राज्य के सेवा क्षेत्र में कार्य करने वाले लोगों को वहां की स्थानीय भाषा आनी चाहिए। उनके रोजाना का काम स्थानीय भाषा के कामचलाऊ ज्ञान से चल सकता है। बड़ा सवाल यह है कि मराठी के कामचलाऊ ज्ञान का पैमाना क्या हो, महाराष्ट्र सरकार का आदेश इस मसले में स्पष्ट नहीं है। विवाद और परेशानी इस वजह से भी है।
सर्विस सेक्टर और रेहड़ी-पटरी लगाने वाले अक्सर कामकाज करते-करते स्थानीय भाषा सीख लेते हैं। दिल्ली के कनॉट प्लेस में हथकरघा और दस्तगारी का सामान बेचने वाली गुजराती महिलाएं कम शिक्षित हैं। लेकिन वे हिंदी ही नहीं, अंग्रेजी, जर्मन और स्पेनिश भी धाराप्रवाह बोल लेती हैं। तमिलनाडु को लेकर धारणा है कि वहां घोर हिंदी विरोधी माहौल है। लेकिन वहां के प्रमुख पर्यटन स्थल महाबलीपुरम् में भीख मांगने वाले भी बहुभाषी मिल जाते हैं, जो हिंदीभाषी सैलानियों से हिंदी में भीख मांगते हैं। वहां घूम-घूमकर छोटे-मोटे सामान बेचने वाली लड़कियां भी तकरीबन अनपढ़ हैं, लेकिन वे हिंदी, गुजराती, बांग्ला आदि बोल लेती हैं। चाहे कनॉट प्लेस के फुटपाथ पर दस्तगारी का सामान बेचने वाली गुजराती महिलाएं हों या कोलकाता की गलियों में दुकान लगाने वाले बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोग हों, अगर वे अंग्रेजी और बांग्ला आदि बोलते हैं तो इसकी वजह कोई स्कूली शिक्षा नहीं, बल्कि रोजाना का संपर्क और जरूरत है। ऐसा नहीं कि महाराष्ट्र के ऑटो-टैक्सी चालक मराठी का कामचलाऊ ज्ञान या समझ नहीं रखते। यहां ध्यान रखने की बात है कि अपनी माटी से दूर जब कोई ऑटो या टैक्सी चलाने का काम चुनता है तो वह तत्काल सड़क पर नहीं उतरता। वह पहले सड़कों को पहचानता है, उनकी भाषा को समझने की कोशिश करता है।
भाषा विज्ञान की नजर से देखें तो मराठी, गुजराती और राजस्थानी ऐसी भाषाएं नहीं है, जिन्हें आम हिंदीभाषी समझ नहीं सकता। ठीक इसी तरह इन भाषा-भाषियों के लिए हिंदी भी ऐसी भाषा नहीं है, जिसे वे न समझ सकें। भाषा को लेकर जब भी कोई विवाद उठता है, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन का एक इंटरव्यू याद आता है। जिसमें उन्होंने अपनी दादी की चारधाम यात्रा का जिक्र किया था। उनकी दादी ने शायद पिछली सदी के दूसरे दशक में तमिलनाडुके पालघाट इलाके के अपने गांव से चारधाम की यात्रा की थी और महीनों बाद सकुशल वापस लौट आई थीं। शेषन ने कहा था कि उनकी दादी तमिल के अलावा कोई अन्य भाषा नहीं जानती थीं, लेकिन उन्हें चारधाम यात्रा से दिक्कत नहीं हुई। सिर्फ शेषन ही नहीं, सदियों से लोग भारत के एक कोने से लेकर दूसरे कोने तक तीर्थ यात्राएं करते रहे हैं। आज तो तकनीक का विस्तार हो गया है, संचार क्रांति हो चुकी है। जब ये सहूलियतें नहीं थीं, तब क्या तीर्थ यात्राएं रूकीं। तब क्या भाषाएं बाधा बनीं। ऐसे में सवाल यह है कि फिर आज भाषा कैसे चुनौती बन सकती है।
कम ही लोग स्वीकार करेंगे, लेकिन राज्यों के पुनर्गठन के लिए बनाए गए फजलुर्रहमान आयोग की रिपोर्ट ही भाषायी उपराष्ट्रीयता को बढ़ावा देने वाली रही। आयोग ने भाषा के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की सिफारिश की थी। इसी के नजीतन भारतीय उपराष्ट्रीयताओं को अपनी भाषाओं के बहाने अपना वर्चस्व साबित करने का आधार मिल गया। इसी वजह से आए दिन राज्यों में अपनी भाषाओं को लेकर अस्मिताबोध जागता रहता है। इस बोध के निशाने पर अक्सर हिंदीभाषी ही रहते हैं। महाराष्ट्र सरकार में शामिल एकनाथ शिंदे की शिवसेना के मूल में भी मराठी उपराष्ट्रीयता और अस्मिताबोध रहा है। इस अस्मिताबोध को शिवसेना संस्थापक बाला साहब ठाकरे ने पहली अभिव्यक्ति 1960 के दशक में मुंबई में मलयाली भाषा-भाषियों के खिलाफ आंदोलन के जरिए दी और बाद के दिनों में उनके भतीजे राज ठाकरे तो इस अस्मिताबोध के दबंग पैरोकार बनकर उभरे। केंद्र सरकार और बैंकों आदि की नौकरियों के लिए परीक्षा देने मुंबई-नासिक आदि पहुंचे हिंदीभाषी छात्रों को बाकायदा पीटकर इस भाषा बोध को राज ठाकरे के कथित सैनिक दिखाते रहे। वे भूल गए कि बंग-भंग के खिलाफ आंदोलन के दौरान 1905 में मराठी मानुष के पूज्य पुरूष बाल गंगाधर तिलक ने वाराणसी की यात्रा की थी। इस दौरान ‘काशी नागरी प्रचारिणी सभा’ में दिए एक व्याख्यान में उन्होंने पुरजोर तरीके से ‘हिंदी को भारत की राष्ट्रभाषा ‘ घोषित किया था। मराठी अस्मिताबोध के शोर में तिलक की यह आवाज अक्सर खोती रही है।
एक खतरा यह भी है कि मराठी के कामचलाऊ ज्ञान की शर्त राज्य के दूसरे धंधे में काम कर रहे लोगों पर भी बाद में लागू हो सकती है। चूंकि उपराष्ट्रीयता वाले इलाकों में अपनी भाषा और संस्कृति का मसला लोगों के मर्म को छूता है, इसलिए राजनीति अक्सर इसे उभारने की कोशिश करती है। मौका देखकर आने वाले दिनों में राज्य में कार्यरत निर्माण मजदूरों आदि पर भी यह शर्त थोपी जा सकती है। इससे निश्चित तौर पर प्रवासी हिंदीभाषियों के लिए संकट पैदा होगा, उससे पलायन भी बढ़ सकता है। जिसकी कीमत राज्य की अर्थव्यवस्था और उद्योग को भी चुकानी पड़ सकती है। इसलिए जरूरी है कि इस मसले पर सर्वमान्य और सर्वस्वीकार्य रास्ता तलाशा जाए। नियमों को बेड़ी नहीं, लोक का सहयोगी होना चाहिए। इस नजरिए से भी इस बारे में विचार होना चाहिए।
आखिर में इस भाषा विवाद का एक सिरा देवेंद्र फड़णवीस के राजनीतिक करीयर से भी जुड़ता है। भारतीय जनता पार्टी का एक वर्ग उनमें राष्ट्रीय राजनीति की संभावना देखता है। महाराष्ट्र तक तो उनका मराठी अस्मिताबोध स्वीकार्य हो सकता है, लेकिन जब वे राष्ट्रीय राजनीति में सफल होने की कोशिश करेंगे, अपनी भाषा बोध के बहाने हिंदीभाषियों का विरोध उनकी राह की बाधा बन सकता है।
- उमेश चतुर्वेदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक समीक्षक हैं..