नए सरकार आने वाले हैं (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Feb 19, 2022

चाहे यह मान लिया जाए कि ओमिक्रोनजी अब जाने को तैयार हैं लेकिन नए सरकार तो आकर ही रहेंगे । काफी कुछ ठिठुरा चुकी सर्दी में नए सरकार ने योजनाबद्ध तरीके से कयासों के हीटर लगवा दिए गए हैं जिसे समझदार जनता इत्मीनान से सेंक रही है। यह हीटर तब तक जलेंगे जब तक सरकार बन न बैठे और वोटरों को बनाना शुरू न कर दे। विवादवार में पार्टियां राजनीति का उच्चतम स्तर पहले ही कायम कर चुकी हैं। वायदे इरादे बांटे जा चुके हैं, आम आदमी हर बार की तरह इस बार भी बेसुध होकर मुग्ध हो चुका है। गज, फुट और इंच जैसे नेताओं के वायदे हज़म करने का अभ्यास अब सभी को है। दिग्गज दिमागों में सरकार साकार हो चुकी है। संभावित मंत्रालयों से किस किस की गोद भराई होगी यह लगभग तय हो लिया है। जिन अफसरान का तबादला आशंकित व संभावित है, वे मानसिक व शारीरिक स्तर पर तैयार होने लगे हैं।

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‘जा रहे सरकार’ ने बहुत सलीके से समझा दिया है कि उन्होंने कितना अधिक विकास किया और ‘आ रहे सरकार’ ने अग्रिम पांच वर्षों के दौरान आशा जगाऊ, ख़्वाब दिखाऊ शैली में संभावित अति विकास के सपने खुली आंख दिखा दिए हैं। असली चुनावी दंगल कम राजनीतिक पार्टियों में होता है। कुछ व्यक्ति अपने दम पर जीतते हैं, बाकी दसियों नहीं सैंकड़ों, पता होते हुए भी, अपनी ज़मानत ज़ब्त करवाकर सरकारी खजाने की आय बढाने का शौक पालते हैं। राजनीति की चारित्रिक विशेषता एंव घोर आवश्यकता बदली नहीं है। वह सरकार, पार्टी व अपनों का जी भर विकास, किसान व गरीबों के किए बढ़िया स्वादिष्ट योजनाएं पकाकर सबको खाने का अवसर देती है। हो सकता है इस बार भी कुछ स्वतंत्र विजेताओं का सोनाचांदी हो जाए या उन्हें मलाल रहे कि वे अच्छी आफर के बावजूद सरकार बनाने जा रहे दलदल में शामिल क्यूं नहीं हुए। प्रसिद्द व समझदार व्यक्तियों व संस्थाओं की तरफ से बार बार आग्रह करने के बावजूद बहुत से नासमझ नागरिक वोट नहीं देते। वे उदास वोटर हैं जिन्हें अभी तक दास वोटर नहीं बनाया जा सका।

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कई घिसेपिटे, पुराने, धोखा खाए, पैसा लुटाए और साथ-साथ शरीर तुड़वाए पूर्व राजनीतिज्ञ भी मानते हैं कि जिन नक्षत्रों में आम वोटरों ने जन्म लिया व जिन निम्न स्तरीय, नारकीय जीवन परिस्थितियों में जी रहे हैं, से उन्हें भगवान के सामने दिन रात की गई लाखों प्रार्थनाएं नहीं निकाल सकीं, हाथ पसार कर वोट मांगने वाला, दिल का मैला व्यक्ति कैसे निकाल सकता है। हम हर बार कहते हैं लोकतंत्र की जीत हुई लेकिन ऐसा नहीं है हम सब मिल कर लोकतंत्र को हराते हैं। हमारे देश के हर चुनाव में आशा, विश्वास, मानवता, धर्म की भी हार ही होती है। इस बारे स्वतंत्र भारत के दशकों पुराने स्वर्णिम इतिहास पर विश्वास किया जाता है। हर बार की तरह, इस बार भी नए सरकार मुस्कुराते हुए, ठाठ से जन्म लेने वाले हैं। यह सामयिक सच, झूठ मान लिय़ा गया है कि अधिकतर नेताओं द्वारा भाग्य तो अपना, अपना, अपना, अपने वफादारों या सरमाएदारों का ही बदला जा सकता है। असली भाग्य विधाता तो हमेशा की तरह ताक़त और पैसा है जिसने कोरोना परिवार को भी डरा रखा है। आने वाले सरकार के निर्माता सब कुछ जानते हैं।  


- संतोष उत्सुक

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