कफ सिरप से बच्चों की मौत की खबरें चिंताजनक, दवाओं की गुणवत्ता पर निगरानी रखना सबसे बड़ी जरूरत

By नीरज कुमार दुबे | Oct 04, 2025

मध्य प्रदेश और राजस्थान से बच्चों की मौतों की जो खबरें आईं, उन्होंने पूरे देश की नींद उड़ा दी है। महज़ खांसी-जुकाम जैसी सामान्य बीमारी के लिए दी जाने वाली खांसी की दवा, बच्चों के जीवन पर इतनी घातक साबित होगी, इसकी कल्पना भी नहीं की गई थी। पिछले एक महीने में मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा ज़िले में 9 बच्चों की मौत और राजस्थान के विभिन्न जिलों में 3 बच्चों की मौत ने चिकित्सा व्यवस्था, दवा नियमन और प्रशासनिक सतर्कता, तीनों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

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हम आपको बता दें कि छिंदवाड़ा के पारासिया और आसपास के गांवों में अगस्त के अंत से बच्चों में सर्दी-खांसी और हल्का बुखार देखा गया। डॉक्टरों ने उन्हें साधारण खांसी की सिरप और दवाएं दीं। लेकिन कुछ ही दिनों में बच्चों की तबीयत बिगड़ने लगी, पेशाब कम होना, शरीर में सूजन और किडनी से जुड़ी जटिलताएं बढ़ने लगीं। नतीजतन, नौ मासूमों की जान चली गई और पांच बच्चे नागपुर में विशेष इलाज के लिए भर्ती हैं।

राजस्थान में हालात और भी उलझे हुए हैं। सरकार द्वारा मुफ़्त दवा योजना में बांटी जा रही डेक्स्ट्रोमेथॉर्फ़न-आधारित सिरप लेने के बाद सीकर, भरतपुर और बांसवाड़ा के कई बच्चों में गंभीर लक्षण दिखे, जैसे- उल्टी, चक्कर, बेहोशी और घबराहट। इनमें तीन बच्चों की मौत भी हो चुकी है। राज्य स्वास्थ्य विभाग ने भले ही इन मौतों को सीधे दवा से जोड़ने से इंकार किया हो, लेकिन तत्काल प्रभाव से संबंधित कंपनियों की दवाओं की आपूर्ति रोक दी गई है। जयपुर स्थित Kaysans Pharma की 19 दवाओं पर रोक इसीलिए लगाई गई क्योंकि कंपनी की दवा गुणवत्ता का रिकॉर्ड पहले से संदिग्ध रहा है। कंपनी के 10,119 सैंपल्स में से 42 घटिया पाए गए थे।

देखा जाये तो भारत दुनिया का "फार्मेसी हब" कहलाता है, लेकिन समय-समय पर घटिया दवाओं के मामले हमारी छवि को धूमिल करते हैं। सवाल यह है कि जब दवा कंपनियों के खिलाफ पहले से संदिग्ध रिपोर्ट थीं, तो उन्हें सरकारी योजनाओं में शामिल क्यों किया गया? साथ ही विशेषज्ञ लगातार कहते आए हैं कि दो साल से छोटे बच्चों को खांसी-जुकाम की दवाएं नहीं दी जानी चाहिए। लेकिन ग्रामीण और अर्धशहरी इलाकों में अक्सर बिना उचित परामर्श के इन्हें दिया जाता है। यही लापरवाही जानलेवा बनती है। केंद्र सरकार ने तो फिलहाल MP के सैंपल्स को सुरक्षित बताया है, लेकिन बाकी रिपोर्टें अभी आनी बाकी हैं। जब तक सभी जांच पूरी नहीं होतीं, तब तक कोई भी निष्कर्ष जल्दबाजी होगा। फिर भी राज्यों और केंद्र के बयानों में तालमेल की कमी आम जनता की चिंता बढ़ाती है।

अक्सर देखने में आता है कि ग्रामीण परिवार खांसी-जुकाम को हल्का समझकर बच्चों को अपने आप ही दवाएं दे देते हैं। यहां यह समझना ज़रूरी है कि बच्चों की रोग-प्रतिरोधक क्षमता अलग होती है और कई दवाओं के दुष्प्रभाव घातक हो सकते हैं।

इस बीच, स्वास्थ्य मंत्रालय ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को साफ़ हिदायत दी है कि दो साल से छोटे बच्चों को खांसी-जुकाम की दवाएं न दी जाएं। डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ को इसके लिए विशेष प्रशिक्षण और दिशा-निर्देश जारी करने होंगे। आगे की राह क्या हो यदि इस पर गौर करें तो सबसे पहला काम यह होना चाहिए कि जिन कंपनियों का रिकॉर्ड खराब है, उनकी दवाओं को सरकारी आपूर्ति श्रृंखला से तत्काल हटाया जाना चाहिए। साथ ही, फार्मा कंपनियों के लिए कठोर ऑडिट और बार-बार टेस्टिंग अनिवार्य की जानी चाहिए। इसके अलावा, जहां प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की भूमिका अहम है, वहां दवाओं के सही उपयोग और खुराक के बारे में स्पष्ट गाइडलाइन दी जानी चाहिए। साथ ही परिवारों को बताना चाहिए कि बच्चों को बिना डॉक्टर की सलाह के खांसी-जुकाम की सिरप न दें। साधारण घरेलू देखभाल जैसे भाप, गर्म पानी और साफ-सफाई कई बार ज्यादा प्रभावी होती है। इसके अलावा, मौत के मामलों पर स्पष्ट रिपोर्ट जनता के सामने समय पर लाना सरकार की ज़िम्मेदारी है, ताकि अफवाहें और डर न फैलें।

देखा जाये तो यह केवल छिंदवाड़ा या राजस्थान का मामला नहीं है, बल्कि पूरे देश के लिए चेतावनी है। बच्चों की ज़िंदगी से जुड़ा यह संकट हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हमारी दवा निगरानी प्रणाली उतनी सख़्त है, जितनी होनी चाहिए? क्या हमने स्वास्थ्य सेवाओं में सतर्कता और ज़िम्मेदारी को पर्याप्त महत्व दिया है?

बहरहाल, इन सवालों के जवाब केवल जांच रिपोर्टों से नहीं, बल्कि प्रणालीगत सुधारों से आएंगे। आज ज़रूरी है कि हर मौत को गम्भीरता से लिया जाए, ताकि भविष्य में कोई मासूम अपनी जान न गंवाए। यह हादसा केवल एक त्रासदी नहीं, बल्कि स्वास्थ्य सुरक्षा तंत्र को मजबूत करने की अनिवार्य पुकार है।

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